हरियाणा साहित्य अकादमी की ओर से आजीवन साहित्य साधना सम्मान के लिए नामित डॉ. हरिश्चंद्र वर्मा को साहित्य और सत्ता में अनुकूल संबंध का न होना खलता है। उनका कहना है कि यदि साहित्य और सत्ता में परस्पर अनुकूल संबंध होता तो उत्तम रहता, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है। सत्ता की परंपरागत प्रवृत्ति के दुष्परिणाम स्वरूप आज भी पूंजीपतियों के पब्लिक स्कूलों में हिंदी, संस्कृत भाषा और साहित्य उपेक्षित है। काव्य शास्त्र, शोध, हिंदी साहित्य का इतिहास और आदिकाल से जुड़ी 37 से अधिक पुस्तकें लिखने वाले 83 साल के डॉ. हरिश्चंद्र ने रविवार को अमर उजाला से विशेष बातचीत में अपने अनुभव साझा किए। पेश हैं सवाल-जवाब के कुछ अंश।
सवाल : साहित्य में विचार की क्या अहमियत है? क्या बिना विचार के रचना की जा सकती है?
उत्तर : गंभीर चिंतन से प्रसूत विचार साहित्य की आत्मा है। किंतु साथ ही यह भी ध्यान में रखने योग्य है कि कोरा चिंतन या विचार नीरस गद्य की सृष्टि तो कर सकता है, लेकिन सरस लयात्मक, भावपूर्ण छंदोबद्ध कविता की रचना नहीं कर सकता। कविता में चिंतन और संवेदनशीलता दोनों के समन्वय की आवश्यकता है।
सवाल : आपकी चर्चित पुस्तक कौन सी है? उसकी क्या खासियत है और अब तक कितने संस्करण छप चुके हैं?
उत्तर: मेरी सबसे चर्चित किताब एक कविता की पुस्तक है। इसका शीर्षक है ‘हिंदू, हिंदी हिंदुस्तान’। हालांकि अभी तक इसका प्रथम संस्करण ही प्रकाशित हुआ है।
सवाल : लेखक के लिए पुरस्कार कितने मायने रखता है?
उत्तर: लेखक के लिए पुरस्कार बेहद प्रेरणादायक सिद्ध होते हैं। इससे आगे बढ़ने का हौसला मिलता है।
सवाल : आपने इतनी किताबें लिखी हैं? अध्यापन के साथ पढ़ने-लिखने का समय कैसे निकाल लिए?
उत्तर : मैंने अपने जीवन में 37 पुस्तकें लिखी हैं। वास्तव में अध्यापन को लेखन से नया चिंतन मिलता है। अध्यापन एक आध्यात्मिक व्यवसाय है। सच्चे साहित्य साधक के पास समय स्वयं ही आ जाता है। मैं 83 वर्ष की आयु में भी निरंतर लिखता रहता हूं।
सवाल : हिंदी का लेखक केवल लिखकर ही जीविकोपार्जन क्यों नहीं कर पाता है?
उत्तर : साहित्यकार को अनुभूति और चिंतन की प्राप्ति के लिए लोक संपर्क अनिवार्य है। जीवन और जगत से कटा हुआ साहित्यकार जीवंत अनुभूतियों से शून्य ही रहता है और शून्य में जीविकोपार्जन असंभव है।
सवाल : हिंदी में पाठक नहीं हैैं या पढ़ने की संस्कृति नहीं है या अच्छा साहित्य नहीं लिखा जाता?
उत्तर : ये बातें हिंदी ही नहीं, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी आदि भाषाओं के साहित्यकारों, साहित्य और पाठकों पर लागू होती है। अच्छाई-बुराई और गुण-दोष सर्वत्र हैं। हां, निरंतर प्रयत्न करने से विकारोें पर संस्कारों की विजय पताका फहरायी जा सकती है।