नेता प्रतिपक्ष अभय चौटाला के निशाने पर मंगलवार को भाजपा और कांग्रेस दोनों ही रही। अभय चौटाला ने कहा कि सरकारी इनेलो से डर गई है इसी कारण विधानसभा का सत्र नहीं बुला रही है। जबकि सीएम ने विधानसभा का विशेष सेशन बुलाने का वादा किया था। उन्होंने कहा कि दंगों, कानून व्यवस्था और आरक्षण आदि के सवालों से बचने के लिए सरकार विशेष सत्र बुलाने से पीछे हट रही है।
अभय चौटाला मंगलवार को गोहाना रोड स्थित गरिमा गार्डन में प्रदेश भर के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की बैठक लेने पहुंचे थे। इस बीच पत्रकारों से बातचीत में अभय चौटाला ने कहा कि सीएम मनोहर लाल खट्टर ने विधानसभा के तीसरे सेशन में स्वर्ण जयंती साल मनाने के लिए वादा किया था, जिसमें 2 दिन ज्यादा का सेशन चलाया जाना था। इस सत्र में पूर्व विधायक, पूर्व मुख्यमंत्री और स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान करने की बात कही गई थी। अब सरकार ने इस सेशन को स्थगित कर दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने ऐसा इनेलो के डर से किया है। जाटों के आंदोलन के समय सभी शर्त मानने की बात सरकार ने कही थी, लेकिन अब न मृतकों के परिजनों को नौकरी दी जा रही है और न मुआवजा दिया जा रहा है। जेल में निर्दोष युवकों को बंद कर दिया गया, उनको छुड़वाया नहीं जा रहा है। अभय ने जाट आरक्षण पर हाईकोर्ट से रोक लगने के लिए भाजपा सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने पीआईएल डालने वालों को भाजपा का आदमी बताया।
सीबीआई के डर से भाजपा के आगे झुके भूपेंद्र हुड्डा
पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर हमला बोलते हुए अभय चौटाला ने कहा कि राज्यसभा चुनाव में उन्होंने साफ कर दिया कि वह सीबीआई के डर से भाजपा के आगे झुक गये हैं। उनको अपने सभी काले कारनामों का पर्दाफाश होने का डर है। चौटाला ने कहा कि अगर ताऊ देवीलाल व चौधरी चरण सिंह के बाद कोई किसान की आवाज उठाने वाला है तो वह पूर्व सीएम ओमप्रकाश चौटाला और पंजाब के सीएम प्रकाश सिंह बादल हैं।
अगस्त में सद्भावना सम्मेलन को दोबारा चलाएगा इनेलो
अभय चौटाला ने कहा कि दंगों के बाद से इनेलो ने प्रदेश में सद्भावना सम्मेलन चलाए हुए है। अभी तक 73 सद्भावना सम्मेलन हो चुके हैं। उनके अनुसार अगस्त में फिर से इसे शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सद्भावाना सम्मेलन में भाईचारा और शांति बनाए रखने के लिए कहा जाता है और दंगों के लिए जिम्मेदार भाजपा और कांग्रेस की पोल खोली जाती है।
इन पर निंदा प्रस्ताव
-बसों का किराया बढ़ाने, महंगाई, डीजल के दाम बढ़ने
-कानून व्यवस्था पूरी तरह से खत्म होने
-स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू नहीं करने
-भर्ती के दौरान युवाओं की मौत होने
-बिजली के निजीकरण को लेकर