क्या आप जानते हैं कि बीमार पड़ने पर दवा के रूप में जो कैप्सूल आप खाते हैं वह ठीक करने की बजाए और बीमार कर सकता है। यदि आप शाकाहारी हैं तो कई दवा कंपनियों के कैप्सूल आपकी की भावनाओं को भी आहत करते हैं। इस संबंध में आपको न तो दवा कंपनियां बताती हैं और न ही आपका डाक्टर। दरअसल, अधिकतर दवा कंपनियां कैप्सूल का कवर एनिमल जिलेटिन से बनाती हैं। इसे बनाने में जानवरों के चमड़े और हड्डी का प्रयोग किया जाता है।
जबकि इसी कवर को सैलूलोज यानी प्राकृतिक तरीके से पेड़-पौधों की कोशिकाओं से बनाया जा सकता है। जिलेटिन से बनाया जाने वाला कैप्सूल कवर जहां लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करता है, वहीं लोगों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाता है। जबकि सैलूलोज कवर वनस्पतियों की कोशिकाओं से बनाये जाने के कारण शाकाहारी की श्रेणी में आता है और हानिकारक भी नहीं होता है।
इसी वजह से कैप्सूल कवर को जिलेटिन से बनाने वाली दवा कंपनियों को पिछले दिनों केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से नोटिस जारी किया गया है। दवा कंपनियों से कहा गया है कि वह कैप्सूल कवर एनिमल जिलेटिन की जगह सैलूलोज से बनाएं। स्वास्थ्य मंत्रालय का नोटिस जारी होने के बाद फार्मेसी सेक्टर में हड़कंप मचा हुआ है।
करोड़ों रुपयों का माल बाजार में होने और कारखानों में करोड़ों का माल तैयार होने की वजह से दवा कंपनियां कुछ दिनों की मोहलत चाहती हैं। दवा कंपनियों की कोशिश है कि किसी भी तरह से मामले को कुछ दिनों के लिए टाल दिया जाए तो उनका करोड़ों का नुकसान होने से बच जाएगा। जबकि इस संबंध में गहन अध्ययन करने वाले जानकारों का कहना है कि लोगों के स्वास्थ्य को देखते हुए जिलेटिन के इस्तेमाल को बंद करना बेहद जरूरी है।
बाहर बताते हैं तो देश में क्यों नहीं ?
एमडीयू में बायोटेक विभाग के पूर्व निदेशक डॉ. बसंत कुमार बेहरा के अनुसार विश्व में जिलेटिन कैप्सूल बनाने में तीसरा स्थान भारत का है। दवा कंपनियां अरब देशों में जब इसकी सप्लाई करती हैं तो वहां की कंपनियों को सर्टिफिकेट देती हैं कि यह हलाल की गई गाय से बनाया गया है, जबकि हमारी कंपनियां और डॉक्टर देश के लोगों को यह भी बताना नहीं चाहती कि जिलेटिन है क्या। डॉ. बेहरा कहते हैं कि जिलेटिन में आने वाला वायरस कभी नहीं मरता। वह 100 डिग्री तापमान में भी खुद को सुरक्षित कर लेता है। इसी से जब कैप्सूल कवर बनाया जाता है तो यह दवा के माध्यम से इंसान के शरीर में पहुंचकर नुकसान पहुंचाता है। डॉ. बेहरा मूलरूप से उड़ीसा निवासी हैं। एमडीयू से सेवानिवृत्त होने के बाद बंगलूरू स्थित नेचुरल कैप्सूल में बतौर टैकभनीकल एडवाइजर, सैनमार स्पेशिलिटी केमिकल चेन्नई में केमिकल एडवाइजर और वर्तमान में अमिटी यूनिवर्सिटी दिल्ली में इंडियन बायोटेक विभाग में निदेशक हैं।
इंडियन फार्मोकोपिया पर असमंजस
हर देश की अपनी फार्मोकोपिया होती है। इसी के अनुसार दवाओं का निर्माण किया जाता है। इसी तरह इंडियन फार्मोकोपिया भी है। मगर इसमें असमंजस यह है कि जिलेटिन दवा में यूज नहीं हो सकता तो लिखा है, लेकिन सैलूलोज का जिक्र नहीं किया गया है। ऐसे में दवा कंपनियां आखिर क्या करें?
दवा लेने का है विकल्प
दवा लेना मरीज के लिए जरूरी है। सैलूलोज कवर में कैप्सूल बाजार में आने में समय लगेगा। ऐसे में मरीजों के पास दवा लेने का आसान विकल्प है। मरीज जिलेटिन कवर वाले कैप्सूल को खोल कर उसकी दवा केले या मिठाई अथवा अन्य किसी खाद्य एवं पेय पदार्थ में मिला कर ले सकते हैं। इससे वह जिलेटिन में पाए जाने वाले वायरस से बचा जा सकता है।