बच्चे का जबड़ा खोलने वाली चिकित्सकों की टीम।
पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय में पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंसेज के चिकित्सकों ने जन्म से बच्चे के जुड़े दोनों जबड़ों का सफल ऑपरेशन कर चिकित्सा जगत में रिकॉर्ड कायम किया है। डॉक्टरों की टीम ने बच्चे का सफल ऑपरेशन कर देश के टॉप तीन में शामिल होने के रिकॉर्ड को कायम रखा है। पीजीआईडीएस के ओरल एंड मैक्सिलोफेसियल सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. विरेंद्र व उनकी टीम को इसके लिए सभी ने बधाई दी है।
पीजीआईडीएस के प्राचार्य डॉ. संजय तिवारी ने बताया कि डॉ. विरेंद्र सिंह, डॉ. अमरीश भगोल, डॉ. राजीव व निश्चेतन विभाग की टीम इस ऑपरेशन के लिए बधाई की पात्र है। उन्होंने यह सर्जरी करके मेडिकल क्षेत्र में रिकॉर्ड बनाने के साथ बच्चे को नया जीवनदान दिया है। डॉ. विरेंद्र सिंह ने बताया कि गत माह उनके पास एक नवजात शिशु ओपीडी में लाया गया था। बच्चे का जन्म पीजीआईएमएस में ही हुआ था। जब बच्चे की जांच की गई तो पता चला कि उसके दोनों जबड़े जन्म से ही जुड़े हैं, ऐसे में बच्चे का ऑपरेशन करने का फैसला लिया गया। बच्चे में रक्त व वजन की कमी को देखते हुए बेहोश कर पाना संभव नहीं था। इसके चलते उसकी सर्जरी को आगे बढ़ाया गया, ताकि उसके ऑपरेशन के दौरान कोई खतरा न रहे। जब बच्चा दो माह का हो गया तो उनके साथ उनके विभाग के डॉ. अमरीश व डॉ. राजीव के अलावा निश्चेतन विभाग के डॉ. एसके सिंगल, डॉ. सुशीला तक्षक, डॉ. प्रशांत व डॉ. दीपिका की टीम बनाकर बच्चे के ऑपरेशन का फैसला लिया गया।
डॉ. अमरीश ने बताया कि बच्चे का ऑपरेशन करीब तीन घंटे तक चला। इसमें ऊपर नीचे का जबड़ा अलग-अलग काट कर विभाजित किया गया और बीच में फ्लैप लगा दिया, ताकि यह आसानी से फिर न जुड़े। डॉ. अमरीश ने बताया कि यदि फ्लैप नहीं लगाया जाता तो यह दो माह बाद फिर जुड़ जाता। बच्चा अभी स्वस्थ है और अब वह अच्छे से दूध पी पा रहा है, इसके चलते उसका वजन भी बढ़ने शुरू हो गया है।
ऑपरेशन में रहा चैलेंज
डॉ. अमरीश ने बताया कि पीजीआईएमएस में इस तरहा का पहला जटिल ऑपरेशन किया गया है। इसमें बच्चे को बेहोश करना बहुत बड़ा चैलेंज था, क्योंकि बच्चे का मुंह बंद था और नाक का रास्ता छोटा था। ऊपर के तालु में भी छेद था। बच्चे का जबड़ा जुड़े होने के चलते नलकी डालने में परेशानी आ रही थी और इसमें संस्थान में आए नए उपकरणों का सहारा लिया गया, इसमें फिट कैमरे के माध्यम से एयरवे चेक किया गया, फिर नलकी डाली गई। इसकी सहायता से बच्चे को एनस्थीसिया दिया गया और दोनों विभागों की टीम ने एक सफल ऑपरेशन करने में कामयाबी हासिल की।