संवाद न्यूज एजेंसी
रोहतक। हौसले मजबूत हो तो कामयाबी जरूरत मिलती है। इसकी बानगी एमडीयू (महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय) में गर्ल्स हाॅस्टल की वार्डन सुनीता मल्हान पेश कर रही हैं। महज 21 की उम्र में एक रेल हादसे में अपने दोनों हाथ गंवाने वाली सुनीता ने हार नहीं मानी और कदम दर कदम सफलताएं चूमती गईं।
जीवन में कुछ कर गुजरने का जज्बा बनाए रखा। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने न केवल खेल क्षेत्र में जीत दर्ज की बल्कि उच्चतर शिक्षा प्राप्त कर वार्डन के पद पर भी सेवाएं शुरू कीं।
सुनीता मल्हान का मानना है कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी आएं, जीवन में कभी हार नहीं माननी चाहिए। सुनीता अब पैरों से ही जीत की पटकथा लिख रही हैं। अब वह दूसरी महिलाओं के लिए भी प्रेरणास्रोत बन गई हैं। उनकी उपलब्धियों को देखते हुए 2009 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी का राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया।
खेलों में जीते हैं 31 पदक
एमडीयू में 35 साल से वार्डन पद पर सेवाएं दे रहीं सुनीता अंतरराष्ट्रीय स्तर की पैरा एथलीट भी रही हैं और उनको भीम अवाॅर्ड भी मिल चुका है। उन्होंने 28 नेशनल व तीन अंतरराष्ट्रीय मेडल जीते हैं। उनका कहना है कि 2002 में दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेना शुरू किया था।
1990 में उन्हें हाॅस्टल वार्डन बनाया गया
मई 1987 में अचानक आए इस संकट ने उनका वैवाहिक जीवन मुश्किल में डाल दिया लेकिन उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा और जीवन में कुछ बेहतर करने का प्रयास करती रहीं। उसी साल एमए की परीक्षा पास की। 1989 में काॅलेज में प्राध्यापिका के पद पर सेवाएं देने का अवसर मिला जबकि 1990 में उन्हें एमडीयू में हाॅस्टल वार्डन बनाया गया।