फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आयुष विभाग का दावा: वायरस से नहीं पित्त की वजह से होता है चिकनगुनिया और डेंगू

Mon, 19 Sep 2016 01:44 AM IST
विनीत तोमर/ अमर उजाला ब्यूरो
विज्ञापन
platelets, dengue - फोटो : Demo Pic
विज्ञापन
चिकनगुनिया और डेंगू के प्रकोप से मचे हाहाकार की असल वजह एडिज मच्छरों के काटने से पनपने वाला वायरस नहीं है, बल्कि चिकनगुनिया और डेंगू की असल वजह वात, पित्त और कफ का बिगड़ता संतुलन है। ये बात थोड़ा हैरान करने वाली जरूर होगी, लेकिन आयुष विभाग आयुर्वेदिक पद्धति को ध्यान में रखते हुए कुछ ऐसे ही दावे कर रहा है। आयुर्वेद में इन बीमारियों के होने का असल कारण त्रिदोष माना जाता है। मसलन, मनुष्य के पित्त का संतुलन बिगड़ने पर बुखार आता है। चिकनगुनिया और डेंगू पर आयुर्वेदिक पद्धति क्या कहती है? रोग की वजह और चिकित्सकों की क्या राय है? इस पर अमर उजाला की विशेष रिपोर्ट।
विज्ञापन


चिकित्सकों के अनुसार, व्यक्ति के शरीर को स्वस्थ रखने के लिए सबसे जरूरी वात, पित्त और कफ का संतुलित होना आवश्यक है। सिविल अस्पताल के आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिकारी डॉ. हरिपाल बुधवार का कहना है कि वात के असंतुलित होने पर सबसे अधिक 80 बीमारियां होती हैं। इसी तरह पित्त के बिगड़ने पर 40 और कफ के असंतुलित होने पर 20 बीमारी शरीर में आ जाती है। पिछले कई दिनों से चिकनगुनिया और डेंगू या अन्य बुखार को लेकर जो हाहाकार मचा है, वह बीमारी इन्हीं तीनों के असंतुलित होने पर हो रही है। पित्त असंतुलित होने पर शरीर में ऊष्मा की कमी होती है, जिस कारण व्यक्ति बुखार से पीड़ित होता है। इसकी खास पहचान यह है कि पित्त के असंतुलित होने पर शरीर का तापमान बढ़ जाता है और तेज बुखार होता है। एलोपैथिक पद्धति में भले ही इनके वायरस हो, लेकिन आयुर्वेद में वायरस को मानकर उपचार नहीं किया जाता है, बल्कि घरेलू औषधियों से तैयार दवाइयों से उपचार किया जाता है। इससे एलोपैथिक पद्धति को अपनाने में होने वाले ज्यादा खर्च से भी बचा जा सकता है।

यह होता है वात, पित्त और कफ

- वात दोष : वात बढ़ने पर जोड़ों का दर्द, लकवा, दमा, शरीर में रूखापन और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।
- पित्त दोष : फोड़ा-फुंसी, त्वचा रोग, लाल निशान, लिवर में पित्त और बुखार आदि भी इसी की वजह से होते हैं।
- कफ दोष : श्वास की बीमारी, खांसी, मधुमेह, जुकाम, आलस्य, मोटापा और ब्लड प्रेशर आदि इसी की वजह से होते हैं।

ऐसे होता है औषधियों से उपचार

- तुलसी के पत्ते का काढ़ा : वायरल बुखार के लक्षण होने पर प्राकृतिक उपचार के लिए तुलसी के पत्ते सबसे अच्छी औषधि है। बैक्टीरियल विरोधी और जैविक विरोधी तुलसी को वायरल बुखार के लिए सबसे अच्छा मानते हैं।
विज्ञापन

- धनिया चाय : धनिया के बीज से शरीर को विटामिन मिलता है। धनिया में मौजूद एंटीबायोटिक यौगिक वायरल संक्रमण से लड़ने की क्षमता रखते हैं।
- सूखी अदरक : अदरक स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी है। इसमें एंटी फ्लेमेबल, एंटीऑक्सिडेंट और वायरल बुखार के लक्षणों को कम करने की क्षमता होती है। इसलिए वायरल बुखार से पीड़ित लोगों को शहद के साथ सूखी अदरक का प्रयोग करना चाहिए।
- मेथी का पानी : मेथी के बीज में डायेसजेनिन, सपोनिन्स और एल्कलॉइड जैसे औषधीय गुण है। मेथी के बीजों का प्रयोग अन्य बहुत सी बीमारियों के इलाज में भी किया जाता है।
- गिलोय : गिलोय के रस में शहद मिलाकर लेने से बार-बार होने वाला बुखार ठीक हो जाता है। इसके अलावा गिलोय के रस में पीपल का चूर्ण और शहद मिलाकर लेने से तेज बुखार और खांसी में आराम मिलता है।
नोट : इसके अलावा भी कई अन्य घरेलू औषधियों से बुखार को भगाया जा सकता है, लेकिन इनका प्रयोग चिकित्सक की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए। बिना सलाह के यह हानिकारक हो सकते हैं। आयुर्वेद चिकित्सालय में इन्हीं औषधियों से तैयार की गई दवाइयां दी जाती हैं।


चिकनगुनिया और डेंगू के लिए संशमनी वटी, गौदंती मिश्रण, अमृतारिष्ट और पुनर्नवादी मंडूर आदि दवाइयां हैं, जिनसे बुखार में आराम मिलता है। ऐसे मरीज को घबराना नहीं चाहिए और जितना हो सके आराम करना चाहिए।
विज्ञापन

- डॉ. सुषमा, जिला आयुष अधिकारी
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें