हम डरती नहीं। यह तो हमारे देश की परंपरा रही है कि अपनों के लिए तो भारतीय नारी इंसान तो क्या भगवान से लड़ जाए। लेकिन रोहतक ने दिल दहला देने वाला धोखा दिया। यहां अपनों को बचाने के लिए अपनों से ही लड़ाई लड़नी पड़ी। साथ वो लोग थे, जो रोजाना मिलते हैं। लेकिन मुकाबला भी उन्हीं लोगों से था, जो शहर की सड़क पर कभी न कभी जरूर मिले होंगे या दिखे होंगे।
जब अपने ही हाथ में हथियार और पेट्रोल बम लेकर मारने आए तो एक बार हिम्मत टूट गई। लेकिन फिर बच्चों का ख्याल आया। लगा कि हमें लड़ना चाहिए। बाहर निकले तो सेना देखकर आस बंधी कि सीमा पर पूरे देश की रक्षा करने वाले जवान क्या एक कॉलोनी को नहीं बचा पाएंगे, लेकिन आदेश आड़े आ गए।
पुलिस और सेना ने भी साथ छोड़ दिया तो हमने खुद कमान संभाल ली और 3 दिन तक 24 घंटे जगकर पूरी कॉलोनी को बचा लिया। दिलेरी की यह कहानी है शहर के पाश इलाके डीएलएफ कॉलोनी की। खुद मोर्चे पर डटी यहां की महिलाओं ने सेना को ताने भी दिए और कहा कि यदि हथियार नहीं चला सकते हैं तो इन हथियारों को हमें सौंप दो।
सरकार ने शहर को अनाथ छोड़ दिया था, लेकिन डीएलएफ कॉलोनी की बच्चों के लिए जान पर खेल गईं। उन्होंने बिना हथियारों के सिर्फ डंडे-बैट और पत्थर के सहारे ही सुरक्षा की। 72 वर्षीय कमलेश की आंखों में आज भी खौफ का मंजर साफ तैरता देखा जा सकता है।
उपद्रवकारी शहर को जला रहे थे। डीएलएफ कॉलोनी को फूंकने की तैयारी की खबर ने सभी के रोंगटे खड़े कर दिए। कॉलोनीवासियों ने बताया कि 19 फरवरी को दोपहर साढ़े 3 बजे सैंकड़ों उपद्रवी पप्पू बेकरी के रास्ते से कालोनी में घुसे। पहले उन्होंने बेकरी और फिर ब्लू बेरी कंफेक्शनरी में तोड़फोड़ करने की कोशिश की। उपद्रवियों ने तोड़फोड़ की शुरुआत ही की थी कि कॉलोनी से भी करीब 200 महिलाएं, पुरुष और युवा डंडे व पत्थर लेेकर पहुंच गए और उपद्रवियों को दौड़ा दिया।
लेकिन 19 और 20 फरवरी के दौरान जब सेना और मिलिट्री फोर्स फ्लैग मार्च करने के लिए कॉलोनी में आई तो कॉलोनी की महिलाओं ने डॉ. विभा के नेतृत्व में हिम्मत दिखाई और जवानों को वापस जाने को कहा। महिलाओं ने कहा, अगर आप सब हथियार नहीं चला सकते हो तो इन्हें हमें सौंप दो... ताकि, हम अपनी और बच्चों की सुरक्षा खुद कर सकें।
दंगाइयों ने हमें बेरोजगार कर दियाअशोका चौक स्थित दुकानों पर नौकरी करने वाले अमित और भारत ने बताया कि उपद्रवियों ने तो हमें बेरोजगार कर दिया है। अब दो जून की रोटियों के इंतजाम के लाले पड़ गए हैं। जिन दुकानों पर हम काम करते थे, उन दुकानों को दंगाइयों ने खाक कर दिया। सब कुछ जलकर राख हो गया है।
परिवार छोड़कर कैसे करें व्यापारडीएलएफ कॉलोनी निवासी पुनीत और कपिल ने बताया कि पिछले 12 दिनों से अपना व्यापार नहीं संभाला है। भले ही सड़कें खुल गई हैं, लेकिन परिवार को लेकर दिल में बहुत डर है। उन्हें दहशत भरे इस माहौल में किस तरह छोड़कर दिल्ली जाएं।
नहीं भूला पाएंगे दहशत भरे दिनदहशत के 5 दिन ताउम्र याद रहेंगे। उपद्रवियों ने दो बार कॉलोनी में घुसने की कोशिश की। पहली बार वे जीप और बाइक पर आए। उनके पास बड़े-बड़े हथियार थे। तब तो कॉलोनी के सभी लोगों ने खुद को घरों में कैद कर लिया। उपद्रवी एक गली में घुसे भी, लेकिन घरों के दरवाजे बंद होने के कारण वापस चले गए। दूसरी बार आने पर पूरी कॉलोनी के लोगों ने उनका सामना किया और भगाया। मेरे दोनों बच्चे बुरी तरह से डरे हुए हैं। उपद्रवियों ने तोड़फोड़ और लूटने के साथ-साथ दहशत भी बहुत फैलाई है।- डॉ. विभा थरेजा।
50 साल पीछे ले गए मेरा रोहतकभारत और पाकिस्तान के विभाजन के समय जो जख्म मिले थे, वह भी इतने दर्दनाक नहीं थे। लेकिन पिछले एक सप्ताह में जो कुछ हुआ, वह मरते दम तक नहीं भुलाया जा सकता।
उपद्रवी मेरे रोहतक शहर को 50 साल पीछे ले गए हैं। कुछ जाति विशेष की दुकानों को चुन-चुन कर जलाया गया है। हमें हमारे अपनों ने ही लूटा है, क्योंकि गैरों के दिए दर्द की तो हम परवाह ही नहीं करते हैं। भले ही अभी माहौल थोड़ा सामान्य हो गया है, लेकिन दिलों से डर दूर नहीं हुआ है।- कमलेश, गृहिणी।
डर से स्वास्थ्य बिगड़ामैंने टीवी में देखा कि कैसे उपद्रवियों ने शहर की दुकानों पर हमले किए। मैं इतना डर गया था कि स्वास्थ्य तक बिगड़ गया। लेकिन जब मिलिट्री कॉलोनी में आई और उनके सामने मेरी मम्मी खड़ी हो गई तो उन्होंने पोजिशन ले ली थी। उस समय मुझे सबसे ज्यादा डर लग रहा था कि कहीं मेरी मम्मी पर वे गोलियां न चला दें। कहीं उपद्रव हमारे घरों में घुसकर हमें मार न दें। स्कूल गए तो 10 दिन से ज्यादा हो गए हैं। डर की वजह से घर में भी अच्छे से पढ़ाई नहीं कर पाया।- भव्य, छात्र।
अपनों ने किया बहुत जुल्महमारे अपनों ने ही हम पर बहुत बड़ा जुल्म किया है। हमारी शौरी मार्केट में कपड़ों की दुकान है। दंगों में हर पल यहीं डर था कि कहीं हमारी रोजी-रोटी न छीन जाए। पुलिस और सेना से तो उम्मीद टूट गई थी। ऐसे में कॉलोनी के सभी लोगों ने मिलकर जिम्मा संभाला और खुद को बचाया।- सुमन हंस, गृहिणी।
लाल मिर्च का पाउडर पानी में मिला रखा छत पर जातीय संघर्ष में अपने परिवार को बचाने के लिए सुरक्षा के तहत छतों पर सोडा की कुछ बोतलें और ईंटें रखीं। दहशत भरे माहौल में रिश्तेदारों ने भी सुरक्षा के लिहाज से उपाय बताए। यहां तक कि लाल मिर्च का पानी तैयार करके भी छतों पर रखा। रात के 1-1 बजे तक कॉलोनी की सभी महिलाएं और बच्चे हाथों में डंडे, बैट व हॉकी लेकर बैठे रहे। क्योंकि प्रशासन व पुलिस से तो उम्मीद रखना बेकार था।
- नेहा, गृहिणी।हमारे अपने ही बने जान के दुश्मन42 साल की उम्र में मैंने इतनी भयावह घटना नहीं देखी। शहर में जो कुछ भी नामी था सब कुछ उजड़ गया। हमारे अपने ही जान के दुश्मन बने हुए थे। घर में खाना नहीं और ऊपर से जान का डर। डीएलएफ कॉलोनी में काफी संख्या में पंजाबी समुदाय के लोग रहते हैं। बस, सभी की हिम्मत से इस मुश्किल घड़ी को पार कर पाए हैं।
- पूनम भ्याना, गृहिणी।फिल्म जैसा था पूरा मंजरदहशत का ऐसा मंजर केवल फिल्मों में ही देखा था। वह एक-एक कर हमारी सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते जा रहे थे। सरकार और प्रशासन मौन था। मैंने मौत को बहुत करीब से देखा है। उपद्रवी मेरे घर से थोड़ी ही दूरी पर खड़े थे। शायद, उस समय भगवान ने मेरी सुन ली। वे केवल हल्ला मचाकर ही वापस चले गए। उन्होंने गली में खड़ी दो गाड़ियों की शीशे भी तोड़ दिए थे।
- कुणाल, छात्र।अभी भी महफूज नहीं हम प्रशासन और पुलिस भले ही माहौल को सामान्य दिखाने की बात कह रही हो, लेकिन हकीकत में अभी भी हम महफूज नहीं हैं। दहशत के दिनों को दिल से निकालना मुश्किल हो रहा है। मेरा 7 साल का बच्चा है। हम मिलकर उपद्रवियों का सामना करने गली में आए।
मैं डंडा लेकर भागा तो मुझे बेटे ने रोका। वह बहुत रोया, क्योंकि तब उसे डर था कि कहीं उपद्रवी उसके पापा को कोई हानि न पहुंचा दें। लेकिन मैंने उसे समझाया और बाहर जाकर उपद्रवियों का सामना कर उन्हें भगाया। हमारी कॉलोनी के सभी लोगों ने टोलियां बनाकर 24-24 घंटे पहरा दिया है।- हितेश बजाज, निजी कोचिंग संचालक।
नहीं पता फिर कब बारूद फट जाएमैंने कभी इतना भयावह और दर्दनाक मंजर नहीं देखा। अभी भी डर लगता है कि न जाने फिर कब से बारूद फट जाए। पहले खुद को सुरक्षित महसूस करती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है।
बेशक सड़कों पर महिला सुरक्षा के नाम पर पुलिस ने सैकड़ों नाके लगा रखे हों, लेकिन मैं अभी भी दहशत में हूं। पुलिस और सेना हमारी कितनी सुरक्षा कर सकती है? यह तो मैंने पिछले सप्ताह ही देख लिया है। अब तो हमें अपनी सुरक्षा खुद ही करनी होगी।- जिया, लेक्चरर।