कैंसर के मरीजों की मौत का सौदा मामले में चल रही एसटीएफ जांच को ध्यान में रखते हुए पीजीआईएमएस प्रशासन ने मरीजों की फाइल जमा न कराने वाले पीजी डॉक्टरों पर सख्ती बरतनी शुरू कर दी है। पीजी की परीक्षा देने वाले डॉक्टरों से इस साल संस्थान ने एफिडेविट लिया है कि जब तक वह अपनी सभी फाइलें जमा नहीं कराते तब तक उनका रिजल्ट जारी नहीं होगा। इन आदेशों के चलते कई डॉक्टरों के भविष्य पर तलवार लटक गई है।
संस्थान में पीजी कर रहे डॉक्टरों को पहले साल हाउस सर्जन की जॉब करनी होती है। इसके तहत उनके पास सामान्य मरीजों के अलावा मेडिको लीगल केस, डेथ वाले मरीजों की फाइल होती है। नियमानुसार इन्हें तय समय में मेडिकल रिकार्ड विभाग में जमा कराना होता है। इसके बाद एनओसी मिलने पर ही उन्हें सेलरी व परीक्षा देने के लिए अनुक्रमांक जारी किया जाता है। सूत्रों की मानें तो कई मरीजों की फाइल न मिलने पर अधिकारी बार-बार निर्देश दे रहे थे, लेकिन इसे अनसुना किया जा रहा था। हाल ही में कैंसर के मरीजों की मौत का सौदा मामला सामने आने पर जब बात अधिकारियों पर आई तो उन्होंने बगैर फाइल अनुक्रमांक जारी करने से मना कर दिया। ऐसा होने पर 50 के करीब डॉक्टरों ने अपनी बात रखी कि उन्हें परीक्षा देने दिया जाए, नहीं तो उनका भविष्य खराब हो जाएगा। पीजी डॉक्टरों की ओर से रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन ने भी अपना पक्ष रखा और अधिकारियों को डॉक्टरों को समय देने की बात कही गई। इस आधार पर प्रशासन ने सभी से एफिडेविट लिया है कि उनका रिजल्ट फाइल जमा कराने के बाद ही जारी किया जाए। गौरतलब है कि मई 2016 से अप्रैल व मई 2017 के बीच के मरीजों की पीजी डॉक्टरों ने फाइल जमा करानी है, जोकि नहीं कराई गई है। यही फाइलें पीजी डॉक्टरों के भविष्य में रोड़ा बनने वाली हैं।
मनमर्जी और विभागाध्यक्षों का आशीर्वाद पहले आता था काम
पीजी डॉक्टरों की इस साल फाइलों को लेकर काफी खिंचाई होने वाली है। सूत्रों की मानें तो अब तक मनमर्जी चलती थी और डॉक्टर अपने विभागाध्यक्षों का आशीर्वाद प्राप्त कर आसानी से नो ड्यूज ले लेते थे और बगैर फाइल जमा कराए चले जाते थे। हाल ही में उठे कैंसर के मरीजों के मामले के बाद स्थिति खराब हो गई और सभी के लिए दो साल पुरानी फाइल जमा कराना अनिवार्य हो गया है।
डीएमएस एमआरडी ने पहले भी उठाया था सवाल
डॉक्टरों की ओर से मरीजों की फाइल समय पर जमा न कराना नया मुद्दा नहीं है। इस संबंध में डीएमएस एमआरडी डॉ. संदीप ने सख्ती बरती तो डॉक्टरों ने दबाव डाल कर उन्हें इस पद को छोड़ने पर मजबूर कर दिया। अब वही सवाल पीजी डॉक्टरों के भविष्य में रोड़ा बन गया है। डॉक्टरों की इस लापरवाही का सबसे अधिक खामियाजा पुलिस व कोर्ट में चल रहे केस से जुडे़ लोगों को भुगतना पड़ता है। अकसर डॉक्टर सरकारी संपत्ति गुम होने पर थाने में चोरी का मामला दर्ज करवा कर अपनी जान बचा लेते हैं।
बोले अधिकारी
एक पीजी के पास पहले वर्ष में 400 के करीब मरीजों की फाइल होती हैं। इन्हें व इनके विभागाध्यक्षों को निर्देश दिया गया है कि जब तक फाइल जमा न हो, इन्हें एनओसी न जारी की जाए और इनका वेतन भी रोक दिया जाए। इसके अलावा इनका रिजल्ट भी रोक दिया जाएगा। फिलहाल इनके आग्रह पर और भविष्य को देखते हुए एफिडेविट के आधार पर परीक्षा देने की अनुमति दी गई है।
- डॉ. रोहतास कंवर यादव, निदेशक, पीजीआईएमएस रोहतक।