मुश्किलें इंसान का हौसला आजमाती हैं, सपनों का पर्दा निगाहों से हटाती हैं। गिर गया तो क्या हुआ संभल-ऐ-इंसान, क्योंकि ठोकरें इंसान को चलना सिखाती हैं...। ये लाइनें आज की युवा पीढ़ी के लिए न सिर्फ प्रेरणादायी हैं बल्कि असफलता अथवा मुश्किलों से जूझने से संबल प्रदान करती हैं।
शुक्रवार को अमर उजाला कार्यालय में संवाद के दौरान शहर के प्रबुद्ध लोगों ने कहा कि माता-पिता की व्यस्तता से बच्चे व युवा सोशल मीडिया को अपनी जिंदगी का तेजी से हिस्सा बना रहे हैं। ऊपर से अभिभावकों की बच्चे से क्षमता से ज्यादा उम्मीद लगाना भी मानसिक रूप से तनाव पैदा करता है। बच्चों को दोस्त बनाकर अच्छाई-बुराई व जिंदगी की हकीकत से रूबरू कराना चाहिए।
वीरवार को मां के ज्यादा मोबाइल फोन पर बात करने से टोकने पर जसिया की एक किशोरी ने आत्महत्या कर ली। इस गंभीर मसले पर अमर उजाला कार्यालय में युवाओं में सोशल मीडिया का क्रेज और अभिभावकों की भूमिका विषय पर संवाद कार्यक्रम हुआ। इसमें शिक्षक, अधिवक्ता, गृहणी, व्यवसायी व समाजसेवियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने कहा कि बच्चा अथवा युवा अचानक जानलेवा कदम नहीं उठाता। मानसिक तनाव के चलते उनकी न सिर्फ दिनचर्या बदलती है बल्कि व्यवहारी भी काफी बदलता है।
एकाकी होना, गुपचुप रहना, ज्यादा समय घर से बाहर रहना, खाना-पीना छोड़ना या कम कर देना मुख्य लक्षण है। अभिभावक व्यस्तता की वजह से बच्चे की तरफ ध्यान नहीं देते हैं। यदि माता-पिता अच्छा दोस्त बनकर बच्चे के साथ रहें तो उसे गलत कदम उठाने से बचाया जा सकता है। आज माता-पिता बच्चे को अपनी नजर के सामने रखने की वजह से मोबाइल फोन थमा देते हैं, जो नहीं होना चाहिए। बच्चे को मैदान में खेलने के लिए भेजना चाहिए, जिससे न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक विकास भी होता है।
इन बातों पर ध्यान रखना जरूरी
- माता-पिता एक अच्छे दोस्त बने। बच्चे की हर बात को सुने और रास्ता सुझाएं
- बच्चा एकाकी रहे, खाना कम खाये, उनकी दिनचर्या बदले तो तत्काल ध्यान दें
- स्कूलों में महानुभावों के स्मृति दिवसों पर अवकाश नहीं बल्कि कार्यक्रम हो
- मोबाइल फोन दें मगर ज्यादा देर तक सोशल मीडिया अथवा खेल नहीं खेलने दें
- आध्यात्म की और भी बच्चों की रुचि बढ़ाए और उसके बारे में जानकारी दें
- बच्चे को कोई न कोई एक फिजिकल खेल खिलाये ताकि उसका विकास हो
जिंदगी की मुश्किलों से संघर्ष करना माता-पिता व शिक्षकों को सिखाना चाहिए। अभिभावकों की अनदेखी से युवाओं ने सोशल मीडिया को जिंदगी का अहम् हिस्सा बना लिया है। बच्चे अब बच्चे किताबों से कम पढ़ते हैं, जो असफलता का कारण होता है।
- डॉ. दीपक भारद्वाज एडवोकेट पूर्व महासचिव बार एसोसिएशन
ज्वाइंट फैमिली में बच्चा परेशानी शेयर करता है मगर ऐसा न्यूक्लियर फैमिली में नहीं होता। बच्चा अपनी परेशानी किसी को नहीं बताता और अंदर ही अंदर घुटता है। उसका व्यवहार बदल जाता है मगर अभिभावक ध्यान नहीं देते और वह गलत कदम उठा लेता है।
- ममता रानी, पूर्व पार्षद
माता-पिता व शिक्षक बच्चों के सामने आदर्श प्रस्तुति करें। बच्चों को महानुभावों के संघर्ष का कहानियां सुनाई ताकि वह जिंदगी में आने वाली मुश्किलों से डटकर मुकाबला करें। अफसोस है कि पहले बच्चे कहानियां सुनकर सोते थे मगर अब ऐसा नहीं होता है।
- डॉ. श्रीभगवान, प्रोफेसर एमडीयू यूनीवर्सिटी
मोबाइल ने बच्चों को फिजिकल वर्कआउट करना बंद कर दिया है। घंटों बच्चे घर में एक स्थान पर बैठकर मोबाइल से खेलते रहते हैं और माता-पिता उसे आंखों के सामने देखते हैं, जो नहीं होना चाहिए। बच्चों की किताबों पढ़ने की आदत लगभग खत्म हो चुकी है।
- डॉ. योगेश, असिस्टेंट प्रोफेसर एमडीयू यूनीवर्सिटी
बच्चों का पहले शारीरिक विकास करना चाहिए। आध्यात्मिकता की ओर भी जोड़ना चाहिए। बच्चे जब गलत रास्ते पर होते हैं, तो वह संकेत देते हैं मगर माताृ-पिता व्यस्तता की वजह से कोई ध्यान नहीं देते। बच्चों के साथ अच्छे दोस्त बनकर उनकी बात को सुने और निदान करें।
- हरिओम भाली, समाजसेवी
बच्चों को मोबाइल फोन नहीं देना चाहिए। यदि बेहद जरूरी है तो की-पैड का फोन दें। मोबाइल गेम की जगह फिजिकल गेम खिलवाए ताकि बच्चे का मानसिक व शारीरिक विकास हो। बच्चों के अच्छे दोस्त बनने पर उसकी खामियां भी पता चलने पर दूर होगी।
- अंकित जैन, व्यवसायी