जाट आरक्षण आंदोलन में किसी भी राजनीतिक पार्टी के खुलकर साथ नहीं आने से जाट उनसे खफा होते दिख रहे हैं। यही कारण है कि प्रदेश में पहली बार जाटों ने खुले मंच से बसपा के साथ जाने की बात कही है। इसकी वजह यह थी कि जाटों को आरक्षण देने की पैरवी बसपा सुप्रीमो मायावती ने की है। बसपा नेता माहौल को देखते हुए जाट नेताओं से संपर्क साधने में लग गए हैं। उनकी कोशिश है कि जाट आरक्षण आंदोलन के सहारे हरियाणा में बसपा की पकड़ मजबूत की जा सके। अगर ऐसा होता है तो प्रदेश की राजनीति में उथल पुथल हो सकती है।
उत्तर प्रदेश की बड़ी पार्टियों में शामिल बसपा काफी समय से हरियाणा में पकड़ मजबूत करने में लगी है। इसके लिए हरियाणा के हर विधानसभा चुनाव में बसपा हाथ भी आजमाती है, लेकिन वह एक सीट से आगे नहीं पहुंच रही है। बसपा ने 2009 के विधानसभा चुनाव में 86 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से केवल एक को जीत मिली थी, लेकिन बसपा के खाते में 6.73 प्रतिशत वोट पहुंच गया था। साल 2014 के चुनाव में बसपा ने सभी 90 सीटों पर प्रत्याशी उतारे लेकिन पलवल की प्रिथला सीट से टेकचंद शर्मा ही इकलौते विधायक बने। बसपा के लिए चिंता की बात यह रही कि उसका वोट प्रतिशत गिरकर 4.40 पर पहुंच गया।
अब बसपा दोबारा हरियाणा में पकड़ बनाने में लगी है। इसके लिए जाट आरक्षण आंदोलन का सहारा लिया जा रहा है। बसपा सुप्रीमो मायावती खुलकर जाटों को आरक्षण देने की पैरवी कर रही हैं। दूसरी ओर, जाटों ने आंदोलन में किसी भी पार्टी के खुलकर साथ नहीं आने से बसपा के साथ जाने की बात कही है। इसकी वजह से भाजपा, कांग्रेस और इनेलो की परेशानी बढ़नी लाजमी है।
जबकि बसपा के लिए सब कुछ राहत भरा हो सकता है। जाटों के बसपा की ओर झुकाव को देखते हुए बसपा प्रदेशाध्यक्ष की ओर से पूरी जानकारी मायावती को दी जाएगी, जिससे यह तय किया जा सके कि वह खुलेआम जाटों के साथ आंदोलन में शामिल होंगे या नहीं।
बसपा सुप्रीमो मायावती पहले ही जाटों को आरक्षण देने की पैरवी कर चुकी हैं। इसलिए इसमें कोई दो राय नहीं कि वह भी चाहती हैं कि जाटों को आरक्षण मिले। प्रदेश में जिस तरह की स्थिति बन रही है, उससे सेंट्रल कमेटी को अवगत कराया जाएगा। जिससे आगे कोई कदम उठाया जा सके।
- नरेश सारन, प्रदेशाध्यक्ष बसपा