सुभाष बराला को दोबारा प्रदेशाध्यक्ष बनाकर पार्टी हाईकमान ने जाटों का डैमेज कंट्रोल रोकने का प्रयास किया है। सीएम गैर जाट होने के कारण पार्टी के लिए जरूरी हो गया था कि प्रदेशाध्यक्ष के पद पर जाट नेता को बैठाया जाए। पंचायत चुनावों को देखते हुए भी बराला को दोबारा कमान सौंपने की बात कही जा रही है।
भाजपा ने 2014 में पहली बार बहुमत आने पर मनोहर लाल खट्टर को सीएम बनाया। पूर्ण बहुमत के साथ पहली बार पार्टी प्रदेश में सत्ता में आई और पहली ही बार में गैर जाट सीएम दिया गया।
हालांकि मंत्रिमंडल में जातिगत समीकरण बैठाने की कोशिश की गई। जाटों का डैमेज कंट्रोल रोकने के लिए ही जाट बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले टोहाना के विधायक सुभाष बराला को कार्यवाहक प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया। उस समय भले ही चुनाव नहीं कराए गए हो और सुभाष बराला को कार्यवाहक के रूप में जिम्मेदारी सौंपी गई हो।
लेकिन एक साल पहले ही यह तय हो गया था कि सुभाष बराला को चुनाव कराकर दोबारा से प्रदेशाध्यक्ष बनाया जाएगा। उस एक साल पहले तैयार हुई रणनीति को शनिवार को स्थायी रूप भी दिया गया। अब पंचायत चुनाव हैं।
भले ही भाजपा ने पार्टी सिंबल पर प्रत्याशी न उतारे हों, लेकिन जिला परिषद सदस्यों को बाहर से सहारा देकर जिला परिषद अध्यक्षों की कुर्सी कब्जाने की पूरी योजना तैयार हो चुकी है। जिला परिषद सदस्यों को जिताकर अध्यक्षों की कुर्सी को जाट नेता के बिना कब्जाना नामुमकिन है। वहीं निकाय चुनाव पर भी इसका असर पड़ सकता है।