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पीजीआई अनजान मरीजों के परिजन बने जन सेवा संस् था व हरिओम सेवा दल

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फोटो :
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पीजीआई के अनजान मरीजों का परिवार बने जन सेवा व हरिओम सेवा दल के सदस्य
-ट्रामा सेंटर व आपात विभाग में आने वाले मरीजों की परिजनों की तरह कर रहे देखभाल
- छह से आठ हजार रुपये में अनजान मरीजों की तीरमारदारी कर रहे युवा
विकास सैनी
रोहतक। घर का पता न नाम का। जाति पता न धर्म। फिर भी अपनों से बढ़कर बच्चों की तरह अनजान मरीजों की देखभाल करते हैं। उन्हें दवा दिलाना, जांच कराना, नहलाना, खिलाना तक खुद करते हैं। है न सराहनीय। जिंदगी और मौत के बीच झूलते अनजान मरीजों को नया जीवन देने वाले कोई और नहीं हमारे बीच रहने वाले कुछ युवा हैं। जन सेवा संस्था व हरिओम सेवा दल के ये सदस्य पीजीआई ट्रामा सेंटर व आपातकालीन विभाग में आने वाले अनजान मरीजों की दिन रात देखभाल करते हैं।
औसतन तीन अनजान मरीज रोजाना आ रहे पीजीआई
पीजीआई के ट्रामा सेंटर व इमरजेंसी में रोजाना औसतन तीन अनजान मरीज आ रहे हैं। प्रदेश के विभिन्न जिलों से हादसों में घायल या बेसुध व्यक्ति को यहां इलाज के लिए लाया जाता है। इसमें कुछ को पुलिस लाती है तो कुछ को सरकारी एंबुलेंस छोड़ जाती है। इसके बाद जन सेवा संस्था व हरिओम सेवादल के अलावा संभालने वाला कोई नहीं होता है। संस्था के सदस्य आने पर ही डॉक्टर इन अनजान मरीजों का इलाज शुरू करते हैं।
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परिजनों को तलाश कर अपनों से मिलवा रही संस्था
पीजीआई में सेवारत ये दोनों संस्थाएं अनजान मरीज को ठीक करने में ही नहीं, उन्हें अपनों से मिलाने का भी भरसक प्रयास करती हैं। इसके लिए वे लगातार मरीज से बात कर उसकी कहीं आधी अधूरी बात से घर का पता तलाशने की जुगत लगाती हैं। उसके बताए पते पर जाकर परिजनों का पता लगाती हैं व उसे उनके सुपुर्द भी करती हैं। ऐसे अनेक मरीजों को ये संस्थाएं मिलवा चुकी हैं।

कर्मचारियों को 8 से 14 हजार रुपये मिलता है वेतन
दोनों संस्थाओं में करीब 25 कर्मचारी हैं। इन्हें मरीजों की देखभाल के लिए हर महीने आठ से 14 हजार रुपये ही मानदेय मिलता है। कम मानदेय के बावजूद इन संस्थाओं के कर्मचारी अपनी सेवा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं।
वर्जन :
पीजीआई में अनजान मरीजों पर ध्यान नहीं दिए जाने के कारण 1988 में पहली बार उनकी देखभाल का अभियान शुरू किया था। खुद अपने हाथों से स्ट्रेचर खींचे हैं। अब संस्था के कुछ सदस्यों को यह जिम्मेदारी सौंपी है। हर दिन संस्था के पास औसतन दो अनजान मरीज रोज आते हैं। साल भर में सात सौ से अधिक मरीज संभालते हैं। इनके परिजनों का पता लगाकर उन्हें घर तक भी पहुंचा रहे हैं। पिछले 30 वर्षों से मरीजों की सेवा ही लक्ष्य है।
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-डॉ. परमानंद महाराज, संस्थापक, जनसेवा संस्था

वर्जन :
पीजीआई में तीन दिसंबर 1998 को संस्था ने अनजान मरीजों की मदद की पहल शुरू की थी। यह प्रयास 20 साल से जारी है। संस्था के पास हर दूसरे दिन एक अनजान मरीज आता है। कभी-कभी यह यह संख्या अधिक भी रहती है। इन मरीजों का इलाज कराने के साथ इनके परिजनों को भी तलाशने का काम करते हैं। परिजनों का पता लगाकर मरीज को उनके सुपुर्द करना सुकून देता है। दो दिन पहले ही वाराणसी की एक लड़की को उसके परिजनों से मिलवाया।
-विजय खुराना, संस्थापक, हरिओम सेवा दल
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