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औलाद के सताये बेसहारा बुजूर्गों को सहारा देते जन शिक्षण संस्थान के वद्धा आश्रम

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औलाद के सताए बेसहारा बुजुर्गों को सहारा देते जन शिक्षण संस्थान के वृद्धाश्रम
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संस्थान की ओर से दी जा रही हैं सभी मूलभूत सुविधाएं
आप बीती बता भावुक हो जाते हैं बुजुर्ग
सुनील सिवाच
महम। ग्रामीण आंचल में रहने वालों को संस्कार और शांति के लिए जाना जाता था। हर व्यक्ति एक दुसरे के सुख और दुख में काम आता था। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों पर भी आधुनिकता की ऐसी मार पड़ी की किसी के पास माता-पिता के सुख दुख में शामिल होने का समय नहीं है। बुजुर्ग परिवार पर बोझ बन गए हैं। संतान के सताए बेसहारा बुजुर्गों का सहारा बने हैं डॉ. जसफूल। इनकी संस्था में ऐसे बुजुर्गों को सहारा दिया जाता है, जिन्हें उनके बच्चे ठुकरा देते हैं। संस्थान के 7 वृद्धाश्रमों में पौने दो सौ से ज्यादा बुजुर्ग रहते हैं।
संस्थान की ओर से गांव सैमाण, भैणी सुरजन, भैणी चंद्रपाल, निंदाना, किशनगढ़ और महम में वृद्धाश्रम चलाए जा रहे हैं। हर आश्रम में 20 से 25 बुजुर्ग रह रहे हैं। अधिकतर आस-पास के गांवों से हैं। दूसरे गांव से आने वाले वृद्ध दिन-रात आश्रम में रहते हैं वहीं उसी गांव से संबंधित रात का खाना खाने के बाद अपने घर चले जाते हैं। आश्रमों में बुजुर्गों के रहन-सहन, खान-पान सहित अन्य सभी मुलभूत सुविधाएं जी रही हैं। अमर उजाला संवाददाता ने आश्रम में रह रहीं बुजुर्ग महिलाओं से बातचीत की तो वे आपबीती सुनाते हुए भावुक हो गईं।
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जरूरत हुई तो बच्चों ने छोड़ दिया साथ
भैणी चंद्रपाल आश्रम में रह रही महिला ओमपति ने बताया कि दो बेटे और एक बेटी है। दोनों बेटे सरकारी नौकरी करते हैं। दिन रात मेहनत कर औलाद को पढ़ाया था। अब बुढ़ापे में उनकी जरूरत पड़ी तो अकेला छोड़ अपने बच्चों के साथ शहर में चले गए।

नरक से भी बदतर हो गई थी जिंदगी
सैमाण आश्रम में रह रही राजपति औलाद के सताने की वजह से आश्रम में रहना पड़ रहा है। बताती हैं कि घर पर नरक से भी बदतर जिंदगी हो गई थी। दिनभर परिजनों के ताने सुनने पड़ते थे। गांव में आश्रम खुलने से शांति मिली है।

एक रोटी के लिए दिनभर करना पड़ता था इंतजार
सैमाण आश्रम में रही रहे पेड़वा निवासी रामचंद्र और सुनीता ने बताया कि बच्चे दिनभर ताने मारते रहते थे। एक रोटी के लिए दिनभर मुंह ताकना पड़ता था। गांव के एक युवक ने आश्रम की जानकारी दी तो यहां पर आए। आश्रम में कार्यरत कर्मचारी सम्मान दे रहे हैं वहीं हर जरूरत को पूरा करने का प्रयास करते हैं।

आश्रम में हो जाता है हल्का मन
भैणी चन्द्रपाल निवासी रोशनी ने कहा कि बच्चे शहर में रहते हैं जिससे घर में अकेल रहना पड़ता है। आश्रम में दिनभर कोई परेशानी नहीं होती है। तीनाें समय अच्छा खाना मिल रहा है। वहीं एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होने से मन हल्का हो जाता है। यहां आकर एक नई जिंदगी मिली है। वहीं जीने का रास्ता भी मिल गया है।

वृद्धाश्रम में दी जा रही हैं सभी मुलभूत सुविधाएं
वृद्धा आश्रम में रह रही महिलाओं के लिए संस्थान की ओर से सभी मुलभूत सुविधाएं दी जा रही है। आश्रम में भोजन, मेडिकल, योग, आवास और लॉकर की व्यवस्था है। आश्रम में तैनात एएनएम कविता ने बताया कि आश्रम में रह रही महिलाओं के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखा जाता है। आश्रम में प्राथमिक उपचार की व्यवस्था है, अगर कोई गंभीर बीमारी हो जाती है तो संस्थान के वाहन से पीजीआई रोहतक भेज दिया जाता है। ईलाज पर होने वाला खर्च संस्थान की ओर से वहन किया जाता है।
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पारिवारिक टूट और संस्कारों की कमी के चलते वृद्ध हैं परेशान : डॉ. जसफूल
संस्थान संचालक डॉ. जसफूल ने कहा कि पारिवारिक टूट और संस्कारों की कमी के कारण वृद्ध आश्रम में रहने पर मजबूर हैं। औलाद को अपने फर्ज और जिम्मेदारियों की जानकारी नहीं है। इसलिए वृद्ध माता-पिता को अकेला छोड़ देेते हैं। माता-पिता को बुढ़ापे में औलाद की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है। बुजुर्गों की परेशानी को देखते हुए आश्रम स्थापित करने का फैसला लिया था। वृद्धों की सेवा करने से आत्मिक शांति मिलती है।

24 एमएचएम 1 भैणी चंद्रपाल स्थित वृद्धाश्रम में सत्संग करती महिला।
24 एमएचएम 2 भैणी चंद्रपाल स्थित आश्रम में बुजुर्गों की स्वास्थ्य जांच करते डॉ.।
24 एमएचएम 3 आश्रम में योग करते बुजुर्ग।
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