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पीजीआईएमएस रोहतक में खुलेगा पहला स्टेट आर्गन एंड टिस्सू ट्रांसप्लांट आर्गेनाइजेशन

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रोहतक। आई, ब्लड, बाडी डोनेट करने वालों की संख्या को देखते हुए मेडिकल साइंस से जुडे़ आर्गन ट्रांसप्लांट एक्सपर्ट उम्मीद कर रहे हैं कि प्रदेश में जागरूकता अभियान चला कर लोगों को आर्गन डोनेट करने के प्रति भी जागरूक किया जा सकता है। इसके लिए स्टेट आर्गन ऐंड टिस्सू ट्रांसप्लांट आर्गेनाइजेशन (सोटो) पीजीआईएमएस रोहतक में अपना नोडल सेंटर बना रहा है। बता दें कि एक ब्रेन डैड मरीज से एक लीवर, दो किडनी, एक दिल, दो फेफडे़, दो आंख, स्कीन आदि किसी जरूरतमंद को डोनेट की जा सकती है। इससे सात मरीजों की जान बचाई जा सकती है।
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माना जा रहा है कि ट्रामा सेंटरों में सड़क दुर्घटना के चलते प्रतिदिन एक से दो मरीज ब्रेन डैड हो जाते हैं। यहां आर्गन डोनेशन के प्रति जागरूकता न होने के कारण उनके सही अंगों का भी प्रयोग नहीं हो पाता। इसके लिए अब पीजीआईएमएस में तैनात स्टाफ ब्रेन डैड मरीजों के परिजनों को प्रेरित करेगा कि वह अपने मरीज के आर्गन डोनेट कर सात लोगों का जीवन बचाएं। भारत सरकार की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल आर्गन एंड टिस्सू ट्रांसप्लांट आर्गेनाइजेशन (नोटो), रीजनल आर्गन एंड टिस्सू ट्रांसप्लांट आर्गेनाइजेशन (रोटो) की तरह पीजीआईएमएस रोहतक में (सोटो) बनाया जा रहा है। रोटो में पांच से छह राज्य आते हैं, यह पीजीआईएमआर चंडीगढ़ में है। इसमें हरियाणा, पंजाब, हिमाचल आदि राज्य शामिल हैं। पीजीआईएमएस रोहतक में सोटो बनाने के लिए 65 लाख रुपये की ग्रांट आई है। इसके तहत स्टाफ की नियुक्ति से लेकर कार्यालय बनाने का खर्च और एंबुलेंस खरीदना तय होगा।
मोहन फाउंडेशन एनजीओ के संस्थापक एवं मद्रास मेडिकल मिशन चेन्नई के सीनियर यूरोलॉजिस्ट ऐंड ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. सुनील सरॉफ देश भर में इसके लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं। ये इस अभियान को सफल बनाने के लिए स्टाफ व डॉक्टरों को प्रशिक्षण देने के अलावा आर्गन ट्रांसप्लांट की हर प्रक्रिया में टीम की मदद करते हैं। पीजीआईएमएस रोहतक में आने वाले मरीजों की संख्या, आईसीयू व एक्सपर्ट की सुविधा को देखते हुए संस्थान में नोडल सेंटर बनाया जा रहा है।
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पीजीआईएमएस में हैं इनके एक्सपर्ट व विभाग
लीवर, किडनी, आईसीयू, एनेस्थिसिया, सर्जरी, माइक्रोबायोलॉजी, पैथोलोजी, यूरोलॉजी, रेडियोलॉजी, कार्डिक सर्जरी

इन अंगों का हो सकता है प्रयोग
एक लीवर, दो किडनी, एक दिल, दो फेफडे़, दो आंख

ट्रांसप्लांट शुरू होने से पहले आर्गन डोनेशन में हो सकती है विशेष भूमिका
एक्सपर्ट मानते हैं कि संस्थान में जब तक आर्गन ट्रांसप्लांट सुविधा शुरू नहीं होती, तब तक यहां एक्सपर्ट डॉक्टर ब्रेन डेड मरीजों के परिजनों को जागरूक कर उनका आर्गन ले सकते हैं। इसके बाद इसे एक से दो घंटे के बीच दिल्ली, गुरुग्राम जैसे बडे़ ट्रांसप्लांट सेंटर में भेज कर कई मरीजों की जान को बचाया जा सकता है।

कुलपति के प्रयास में कुछ डॉक्टर बन रहे रोड़ा
संस्थान के कुलपति डॉ. ओपी कालरा प्रयासरत हैं कि सोटो सेंटर जल्द से जल्द कार्य शुरू हो, ताकि प्रदेश आर्गन डोनेट कर सबसे अधिक लोगों की जान बचाने में देश भर में नंबर आ सके। अधिकारी मानते हैं कि जिस प्रकार प्रदेश के लोग रक्तदान, नेत्रदान व देहदान करने में आगे हैं, उसी प्रकार वह आर्गन डोनेट करने में भी पीछे नहीं हटेंगे। यह कार्य मानवता की भलाई के लिए है। एक व्यक्ति के डोनेट किए गए आर्गन से सात लोगों की जान बचेगी।

यह होती है प्रक्रिया
सड़क दुर्घटना या किसी कारण से किसी व्यक्ति का ब्रेन डैड हो जाता है। मरीज के ब्रेन डैड होने की पुष्टि एक्सपर्ट डॉक्टरों की टीम करती है। ऐसे मरीज में जीवन की कोई गुंजाइश नहीं होती। ब्रेन डैड मरीज से उसके आर्गन लेने के लिए कुछ समय मिलता है, इसी दौरान टीम परिजनों को जागरूक करती है और सात अन्य मरीजों का जीवन बचाने के लिए प्रेरित करती है। परिजनों के तैयार होने के बाद ट्रांसप्लांट टीम आर्गन के लिए वेटिंग में चल रहे मरीजों को लिस्ट के हिसाब से इसे डोनेट कर देती है।
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