आधुनिक युग में अब धीरे-धीरे तीज के त्योहार पर भी बदलाव का असर साफ दिखता है। अब न तो महिलाओं की मंडलियां गीत गुनगुनाती नजर आती हैं और न ही झूले पड़ते हैं। कभी तीज का त्योहार दस दिन तक उत्सव के तौर पर मनाया जाता था। हालांकि आज शहर में युवाओं की ओर से पंतगबाजी भी की जाती है। शहर में घरों छतों पर युवाओं की ओर से पतंग प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता रहा है।
सावन के महीने में तीज का खास महत्व है। क्योंकि तीज के बाद त्योहार शुरू होते हैं। महिलाएं तीज की तैयारियां एक-एक महीना पहले शुरू करती थीं। घर में पकवान बनाने से लेकर सिंधारा देने की तैयारी होती थी। नई नवेली दुल्हन के लिए यह त्योहार खास होता था। महिलाएं दस दिन पहले से ही झूला झूलना शुरू कर देती थी, लेकिन अब झूले पेड़ों की बजाए घरों में डाले जाते हैं। अब सार्वजनिक रूप से पर्व न मनाकर केवल घर-परिवार या फिर मोहल्ले तक ही सीमट कर रह गए हैं। इस दिन महिलाएं अपने हाथों में मेहंदी रचाती हैं तथा व्रत भी रखती हैं। इस पर्व पर घेवर, फेनी और सेवईयों का प्रचलन अधिक है। तीज से एक दिन पहले बहनों और बहुओं को सिंधारा दिया जाता है। इसमें वस्त्र, सौभाग्य सामग्री, घेवर, फेनी, फल आदि झूल-पटरी शामिल होता है।
संकट के कारण नहीं लगेंगे ग्रामीण अंचल के मेले
कोरोना संकट के दौरान ग्रामीण आंचल में पर्व पर लगने वाले मेले एवं कुश्ती दंगलों का भी आयोजन नहीं होगा। इसके अलावा भीड़ जुटाने की अनुमति नहीं होने के चलते इस बार यह पर्व फीका रहेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व पर जिलाभर में कुश्ती दंगल, मेले, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि का आयोजन होता था। लेकिन जिला में लगातार कोरोना संकट बढ़ रहा है।
एक माह पूर्व होती थी तैयारी: सरिता देवी
शहर निवासी सरिता देवी ने बताया कि पहले एक माह पूर्व ही तीज पर्व की तैयारी शुरू हो जाती है। लेकिन सभी के पास समय का अभाव है जिसके आगे तीज त्योहार एक माह की बजाए एक दिन ही मनाए जाते हैं। छोटी बच्चियां व युवतियां प्रतिदिन झूला झूलने के साथ-साथ लोक गीत गाती थी।
तीज के झूले हुए गायब: सुशीला यादव
उप जिला शिक्षा अधिकारी डॉ. खुशीराम की पत्नी सुशीला यादव ने बताया कि पहले एक सप्ताह पूर्व सुहागिनें हाथों में मेंहदी रचाती थी। पेड़ पर झूला डालकर महिला लोक गीत गाती थी। पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सजकर झूला झूलती थी। लेकिन लेकिन अब हर चीज आधुनिक हो गई है।
निभाई जा रही हैं प्राचीन परंपराएं : डॉ. सुधा यादव
शहर के सेक्टर चार निवासी डॉ. सुधा यादव ने बताया कि प्राचीन परंपराएं अब भी जारी हैं। बस आधुनिकता के चलते इनका स्वरूप बदल गया है। पहले महिलाएं टोलियों में झूल झूलने जाती थी। लोक गीतों की धुन पर झूले का आनंद ही अलग था। लेकिन अब बच्चों के लिए घर में ही झूले डालने पड़ते हैं।
महिलाओं के लिए विशेष है यह पर्व: सुमनलता
सुमनलता ने बताया कि वर्तमान में कोरोना संकट के दौरान शहर में तीज पर्व घरों में रहकर मनाएंगे। लगातार बढ़ रहे संक्रमण के आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए परिवार के साथ सुरक्षित रहते हुए पर्व मनाएंगे। कोरोना संकट के दौर में बाजारी खाना न खाकर घरों पर पकवान बनाएंगे। महिलाओं के लिए यह पर्व उमंगभरा है। धूमधाम से मनाएंगे पर्व
परिवार को रखें सुरक्षित: काजल वर्मा
शहर के सेक्टर चार निवासी काजल वर्मा ने बताया कि इस बार कोरोना संकट के पर्व की सभी तैयारी घर पर ही चल रही हैं। ब्यूटी पार्लरों में जाने की बजाए अधिकांश महिलाएं घरों पर ही सज संवरकर पर्व मनाएंगी। घर पर शुद्ध पकवान बनाकर परिवार को भी सुरक्षित रखना है।
कोरोना को ध्यान में रखकर मनाएंगे खुशियां: नूतन सिंह
शहर निवासी नूतन सिंह ने बताया कि इस बार कोरोना संकट खड़ा है। सभी महिलाएं अपने घरों पर परिजनों के साथ तीज पर्व मनाएंगी। कोरोना के दौरान अधिक भीड़ से बचते हुए अपने परिवार के साथ रहकर पर्व मनाएंगे। आधुनिकता की चकाचौंध में न रहते हुए पारंपरिक तरीके से पर्व मनाने का आनंद ही अलग है।