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देश की सीमाओं पर सीना ताने खड़े रहते हैं जिले के जवान, कारगिल में तीन हुए थे शहीद

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शहदी सुखबीर यादव की पत्नी सुधा यादव से बात करते पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, साथ में मौ - फोटो : Rewari
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रेवाड़ी। सेना में वीरता दिखाने की जब बात आती है तो रेवाड़ी के जवान सीना ताने खड़े नजर आते हैं। आजादी के पूर्व और बाद में जितने युद्ध हुए सभी में यहां के जवानों का शौर्य सामने आया है। कारगिल की दुर्गम चोटी पर तिरंगा फहराने निकली भारतीय सेना में जिले के वे तीन जवान भी शामिल थे। जिन्होंने सीने पर गोली खाकर भी भारत माता का जयघोष किया।
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कारगिल में भी यहां के जवानों का बलिदान स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है। रेजांग्ला की दुर्गम पहाड़ियों की तरह ही कारगिल क्षेत्र में भी भौगोलिक स्थिति भारतीय सैनिकों के विपरीत थी। लेकिन सैनिकों का जज्बा दुश्मन पर भारी पड़ा।
डिप्टी कमांडेंट सुखबीर सिंह का बलिदान अमूल्य
गांव धामलावास निवासी डिप्टी कमांडेंट सुखबीर सिंह को अहीरवाल क्षेत्र कारगिल के प्रथम शहीद के रूप में हर वर्ष नमन करता है। 26 मई 1999 को सायं पौने आठ बजे वह अपने साथियों सहित कारगिल क्षेत्र के छेनीगुंढज इलाके में बर्फीली सर्द हवाओं के बीच मुस्तैदी से तैनात थे। वह एक चेक पोस्ट का निरीक्षण करने जा रहे थे, तभी घाटी में घात लगाकर बैठे पाक आतंकवादियों ने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। आवाज सुनकर सुखबीर सिंह चौकन्ने हो चुके थे। उन्होंने जवाबी फायर किया, लेकिन गोलाबारी के बीच उग्रवादियों ने एक गोला उनकी ओर फेंक दिया। जिससे सुखबीर सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए, परंतु उन्होंने धैर्य नहीं खोया और घायल होने के बावजूद जवानों को दुश्मनों से लड़ने का आदेश देते रहे। घायल सुखबीर को तत्काल श्रीनगर के आर्मी अस्पताल में पहुंचाया गया, परंतु उनका जीवन बचाया नहीं जा सका। वर्ष 1999 में उन्हें जम्मू-कश्मीर में तैनात किया गया था, परंतु यह उनकी अंतिम नियुक्ति सिद्ध हुई। 26 मई 1999 को देश के लिए वह शहीद हो गए।
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सूबेदार रामनिवास व हवलदार साधुराम हुए शहीद
गांव रतनथल बास निवासी सूबेदार रामनिवास का नाम भी कारगिल शहीदों में प्रमुखता से लिया जाता है। रामनिवास कारगिल के उड़ी सेक्टर में 9 राजपूत रेजिमेंट में तैनात थे। इस बीच 21 अक्टूबर 1998 को देश की सीमा में घुसे दुश्मनों से लड़ते हुए वह मार्ग भटक गए। उस समय बेशक उनकी शहादत को गुमनाम कहकर सम्मान नहीं मिल पाया। परंतु लगभग सात माह बाद 8 मई 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान कश्मीर घाटी में उनका पार्थिव शरीर मिला तो उनकी शहादत पर छाया कोहरा भी छंट गया। तत्कालीन कार्यवाहक कमान अधिकारी ने शहीद रामनिवास की पत्नी वीरांगना फूलवती को 10 मई 1999 को पत्र भेजकर उनके बलिदान को राजपूत रेजिमेंट के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखने की सूचना दी। कमान अधिकारी ने ही यह खुलासा किया था कि रामनिवास ने वीरता से लड़ते हुए ही कुर्बानी दी थी। दूसरी ओर कारगिल विजय दिवस 26 जुलाई के बाद भी शहादत का सिलसिला थमा नहीं था। यहां के मंदौला निवासी हवलदार साधुराम ने 4 सितंबर 1999 को देशसेवा में कारगिल में ही अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
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