रेवाड़ी। इंश्योरेंस कंपनी इसलिए किसी भी क्लेम देने से नहीं बच सकती कि बीमा धारक ने अपनी पुरानी बीमारी पॉलिसी लेते समय कंपनी को नहीं बताई थी। उक्त बातें जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष संजय कुमार खंडूजा एवं सदस्य राजेंद्र प्रसाद ने अपने संयुक्त निर्णय में स्पष्ट की। अपने निर्णय में उपभोक्ता आयोग ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए लिखा है कि बीमा कंपनियां स्पष्ट रूप से बीमा धारक को अपनी पॉलिसी के बारे में पॉलिसी बेचते समय नहीं बताती है, जोकि न्याय संगत नहीं है। इतना ही नहीं उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया है कि इस कारण को आधार बनाते हुए अक्सर बीमा कंपनियां क्लेम देने से मना कर देती है। जबकि बीमा लेने वाला व्यक्ति सबसे कमजोर पक्ष होता है और उसे प्रीमियम देने के बावजूद भी क्लेम राशि नहीं मिल पाती है।
आयोग ने आदेश दिया है कि बीमा कंपनी शिकायतकर्ता को उपचार में खर्च की गई पूरी राशि 2,12,157 रुपये 9% ब्याज सहित शिकायत दायर करने से जब तक पैसा नहीं दिया जाता अदा करेगी।
इसके साथ ही कंपनी पर 40 हजार रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति के तौर पर हर्जाना देने तथा 11 हजार वाद खर्च के लिए शिकायतकर्ता को दिए जाने के आदेश दिए हैं। यह पूरी राशि 45 दिन के अंदर शिकायतकर्ता को अदा करनी होगी।
मॉडल टाउन निवासी भारत भूषण कालड़ा का है मामला
शहर के मॉडल टाउन निवासी भारत भूषण कालड़ा ने चोलामंडलम जनरल इंश्योरेंस कंपनी से हेल्थ पॉलिसी ली हुई थी। यह पॉलिसी 9 मार्च 2022 से लेकर 8 मार्च 2023 तक वैध थी। इसमें कंपनी ने 5 लाख का रिस्क कवर बीमा किया हुआ था। पॉलिसी पिछले 4 सालों से लगातार चल रही थी। 8 फरवरी 2023 को भारत भूषण कालड़ा अपने घर में स्थित बाथरूम में गिर गए। इस कारण उन्हें चोट आई और उनके बाएं पैर का ऑपरेशन एक निजी अस्पताल में कराना पड़ा। जब इस बारे में इंश्योरेंस कंपनी से क्लेम किया तो कंपनी ने यह राशि इसलिए देने से मना कर दिया कि भारत भूषण कालड़ा पिछले 12 साल से शुगर एवं 10 साल से बीपी के मरीज हैं, लेकिन उन्होंने पॉलिसी खरीद करते समय यह जानकारी छुपाई है। इतना ही नहीं इंश्योरेंस कंपनी ने 18 जुलाई 2023 को पत्र जारी कर उनकी क्लेम राशि रिजेक्ट कर दी और पॉलिसी भी रद्द कर दी।
2 अगस्त 2023 को दायर की थी शिकायत
इसके बाद भारत भूषण कालरा ने जिला उपभोक्ता आयोग में 2 अगस्त 2023 को शिकायत दायर की। शिकायत में इंश्योरेंस कंपनी से उनके उपचार में खर्च राशि 2,12,157 रुपये दिलाने साथ ही मानसिक परेशानी के लिए अलग से क्षतिपूर्ति दिलाए जाने की मांग की। शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत के साथ सभी सबूत व पॉलिसी के दस्तावेज और बिल भी प्रस्तुत किए। इस मामले में भी उपभोक्ता आयोग ने कहा कि शुगर एवं बीपी से कोई बीमारी शिकायतकर्ता को नहीं हुई थी, बल्कि अचानक गिरने के कारण उनके पैर में फ्रैक्चर हो गया था। जिसका उपचार कराया गया था। इतना ही नहीं सबूत का हवाला देते हुए उपभोक्ता आयोग ने स्पष्ट किया कि इसी कंपनी ने शिकायतकर्ता के आंख का ऑपरेशन करने का खर्च भी 39 हजार बीमा राशि से अदा किया था, लेकिन अब बीमा कंपनी ने जानबूझकर उन्हें क्लेम देने से मन कर दिया है।