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Rewari News: कोर्ट ने एचएसवीपी की कार्रवाई को अवैध करार कर दुकान का आवंटन किया बहाल

Wed, 28 Jan 2026 12:17 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
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रेवाड़ी। अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) अर्चना की अदालत ने सेक्टर-3 पार्ट-1 स्थित दुकान संख्या 12 के आवंटन से जुड़े 18 वर्ष पुराने विवाद में फैसला सुनाते हुए हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (पूर्व में हुडा) की कार्रवाई को अवैध करार दिया है। कोर्ट ने दुकान का आवंटन रद्द करने के आदेश को निरस्त करते हुए वादी संदीप गोयल के पक्ष में फैसला सुनाया है और विभाग को दुकान का आवंटन बहाल करने का आदेश दिया।
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मामले में एस्टेट ऑफिसर हुडा, सिटी डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफिसर रेवाड़ी, प्रशासक शहरी विकास प्राधिकरण गुरुग्राम, कलेक्टर रेवाड़ी को पार्टी बनाया गया था।
न्यू ग्रेन मार्केट संदीप गोयल ने 28 दिसंबर 2005 को हुडा (अब एचएसवीपी) की ओर से आयोजित नीलामी में दुकान संख्या 12 सेक्टर-3 पार्ट-1 के लिए भाग लिया था। उन्होंने सबसे ऊंची बोली लगाई। उन्होंने उसी दिन 1,63,500 रुपये जमा किए।
इसके बाद हुडा की ओर से 23 मार्च 2006 को उन्हें आवंटन पत्र जारी किया गया। 26 अप्रैल 2006 को दुकान का कब्जा भी सौंप दिया गया। दुकान का कुल क्षेत्रफल 40 वर्ग मीटर बताया गया है।
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वादी ने अदालत को बताया कि आवंटन की शर्तों के अनुसार शेष राशि 30 दिनों में जमा की जानी थी लेकिन कुछ कारणों से 15 प्रतिशत राशि 103 दिन की देरी से 3 जुलाई 2006 को जमा हुई।
यह राशि विभाग ने इस शर्त के साथ स्वीकार की कि देरी की मंजूरी उच्च अधिकारियों से प्राप्त की जाएगी। वादी का आरोप था कि इसके बाद वर्षों तक विभाग ने न तो देरी की स्वीकृति दिलवाई और न ही कोई स्पष्ट निर्णय लिया, जिससे वह दुकान का विकास या सजावट तक नहीं कर सका। संवाद
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थक हारकर 2018 में अदालत का दरवाजा खटखटाया
संदीप गोयल ने बताया कि उन्होंने कई बार विभाग के चक्कर लगाए और 27 अप्रैल 2016 को लिखित रूप से दुकान सरेंडर कर राशि लौटाने का अनुरोध किया लेकिन विभाग ने कोई कार्रवाई नहीं की। 2018 में उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। इस बीच, वर्ष 2021 में विभाग ने अचानक यह कहते हुए दुकान का आवंटन रद्द कर दिया कि भुगतान में देरी की मंजूरी सक्षम प्राधिकारी से नहीं ली गई थी और 10 प्रतिशत राशि जब्त कर ली गई।
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अदालत ने फैसले में कही ये बातें
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह वादी की ओर से जमा की गई देरी वाली राशि की स्वीकृति के लिए समय रहते सक्षम प्राधिकारी को प्रस्ताव भेजता। रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि वर्षों तक विभाग ने इस संबंध में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की और 10 साल से अधिक समय बाद मनमाने ढंग से आवंटन रद्द कर दिया जो न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने कहा कि विभागीय लापरवाही का खामियाजा आवंटी पर नहीं डाला जा सकता। न्यायालय ने विभाग की इस कार्रवाई को रद्द कर दिया। साथ ही आदेश दिया कि विभाग दुकान का आवंटन बहाल करें और वादी को नोटिस देकर यह स्पष्ट करें कि वह आवंटन स्वीकार करता है या नहीं। अदालत ने कहा कि यदि वादी आवंटन स्वीकार करता है तो भविष्य में देय वैध शुल्क उसे जमा करना होगा। यदि वह लिखित रूप से आवंटन स्वीकार करने से इनकार करता है तो विभाग को उसकी जमा राशि 4,08,750 रुपये 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित मुकदमा दायर करने की तिथि से भुगतान करना होगा।
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