सर्कुलर रोड के पास गणेश जी की मूर्ति खरीदते लोग। संवाद
रेवाड़ी। श्रीगणेश उत्सव इस बार 27 अगस्त से शुरू हो जाएगा। शहर में भी धीरे-धीरे श्रीगणेश चतुर्थी को लेकर अनेक जगह भव्य आयोजन होते हैं। जिले में 15 से ज्यादा जगह पर सामूहिक समारोह के लिए पंडाल सजेंगे। कई जगह पांडाल को लेकर समिति बनाने व अन्य तैयारी शुरू कर दी गई है।
शहर के हर एंट्री प्वाइंट पर भगवान श्रीगणेश की मूर्ति बनाने वाले कारीगरों ने दुकानें सजा दी हैं। शहर के राव अभय सिंह चौक से झज्जर की तरफ जाने वाले बाइपास पर भी कई जगह श्रीगणेश की मूर्तियां बनाने का काम पूरा हो चुका है। जिले में 50 से अधिक स्थानों पर श्री गणेश की मूर्तियां स्थापित की गई थीं।
भगवान गणेश की मूर्तियों का गांव कालाका, पटौदी रोड, गोकलगढ़ स्थित नहर में विसर्जन किया गया था। नहर में मूर्ति विसर्जन पर प्रशासन ने पिछले कई वर्षों से प्रतिबंध लगाया है। इसके बाद भी श्रद्धालु गणेश की मूर्तियों को नहरों में विसर्जित करते हैं। हर बार नहरों में गंदगी काफी बढ़ जाती है।
पहले मूर्ति विसर्जन करते समय हादसे भी हुए हैं। पानी भी गंदा हो जाता है जिसे साफ करने में जनस्वास्थ्य विभाग को अतिरिक्त मेहनत व खर्चा करना पड़ता है।
25 सालों से भगवान श्रीगणेश की मूर्तियां बनाते आ रहे
राजस्थान के पाली जिले के कारीगर श्रवण का कहना है कि वे 25 सालों से भगवान श्रीगणेश की मूर्तियां बनाते आ रहे हैं। उनका पूरा परिवार इस कार्य में लगा हुआ है। उन्होंने बताया कि 3 माह पहले ही मूर्तियां बनाने का काम शुरू कर दिया था। मिट्टी की छोटी मूर्तियां बना रहे हैं। हालांकि उनके पास पीओपी की 9 फीट तक की मूर्तियां भी उपलब्ध हैं।
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भगवान श्रीगणेश, मंगल और शुभ के देवता
पंडित वेदप्रकाश तिवारी ने बताया कि भगवान श्रीगणेश, मंगल और शुभ के देवता है। जहां स्थापित होते हैं वहां शुभ हो जाता है। श्रीगणेश पुराण के अनुसार सुख, समृद्धि, शुभ-लाभ और वैभव बना रहता है। इसलिए मंगल मूर्ति कहा जाता है। श्रीगणेश स्थापना के साथ शुभ-लाभ रिद्धि-सिद्धि की स्थापना भी होती है। ये शक्तियां अपने नाम से ही प्रभाव देती हैं। यह उत्सव 10 दिनों तक चलता है। जिसमें बड़े-बड़े पंडालों में गणपति बप्पा को विराजमान कर उनकी पूजा उपासना की जाती है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी और शुक्लपक्ष के चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के रूप में मनाते हैं।