रेवाड़ी। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश विकास गुप्ता की अदालत ने मेडिकल बिल प्रतिपूर्ति से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है। करीब 3 साल 7 महीने बाद आए इस फैसले में अदालत ने शिक्षक को देरी से भुगतान पर ब्याज देने का आदेश दिया है लेकिन अतिरिक्त मेडिकल क्लेम देने से इंकार कर दिया।
अदालत ने कहा है कि निश्चित रूप से 6% प्रतिवर्ष की दर से शिक्षक ब्याज पाने का हकदार है। गांव नांगल जमालपुर निवासी शिक्षक हरिप्रकाश ने अपने पिता के इलाज पर करीब 1 लाख 70 हजार रुपये खर्च किए थे। उन्होंने यह उपचार नारनौल के एक निजी अस्पताल में आपात स्थिति में कराया था।
इसके बाद उन्होंने मेडिकल बिल विभाग को प्रस्तुत कर प्रतिपूर्ति की मांग की। शिक्षा विभाग की ओर से 1,03,686 रुपये की राशि का भुगतान कर दिया गया जबकि शेष राशि देने से इंकार कर दिया। इस पर हरि प्रकाश ने सिविल कोर्ट में वाद दायर किया था जिसे निचली अदालत ने 7 जुलाई 2022 को खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ उन्होंने फिर अपील दायर की थी।
संबंधित अस्पताल हरियाणा सरकार के पैनल में नहीं था शामिल
27 मार्च को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि संबंधित अस्पताल हरियाणा सरकार के पैनल में शामिल नहीं था। ऐसे मामलों में सरकारी नियमों के अनुसार केवल पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ की दरों के आधार पर ही भुगतान किया जा सकता है। शिक्षक को पहले ही नियमानुसार भुगतान किया जा चुका है इसलिए अतिरिक्त राशि का दावा उचित नहीं है।
पक्षकारों को अपने-अपने खर्च वहन करने के निर्देश
अदालत ने यह भी पाया कि विभाग द्वारा भुगतान करने में लगभग 2 साल 9 महीने की देरी हुई जिसका कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। इस पर अदालत ने वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया। यह ब्याज मेडिकल बिल जमा करने के तीन महीने बाद से लेकर भुगतान की तारीख तक दिया जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारी को मेडिकल प्रतिपूर्ति का अधिकार है लेकिन यह निर्धारित नियमों के तहत ही दिया जा सकता है। अदालत ने निचली अदालत के फैसले में आंशिक संशोधन करते हुए अपील को आंशिक रूप से मंजूर कर लिया और पक्षकारों को अपने-अपने खर्च वहन करने के निर्देश दिए।