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पड़ताल: नशा मुक्ति केंद्र को 11 महीने से नहीं मिला एक पैसा, कैसे हो काम

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रेवाड़ी। जिले में एकमात्र नशा मुक्ति केंद्र पिछले 29 सालों से अपने भवन का इंतजार कर रहा है। केंद्र को हर साल मिलने वाली ग्रांट भी सही समय पर नहीं मिल पा रही है। इसससे कर्मियों का परिवार का गुजारा ठीक नहीं चल रहा है।
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शनिवार को अमर उजाला की टीम ने शहर के सर्कुलर रोड स्थित नशा मुक्ति केंद्र की पड़ताल की तो उसमें कर्मचारी अपने-अपने कार्यालय में बैठे मिले। मौके पर प्रोजेक्टर कोर्डिनेटर जोगिंद्र सिंह मिले। उन्होंने बताया कि उनके केंद्र में फिलहाल 8 मरीज हैं। 90 फीसद मरीज नशे की आदत छोड़कर जाते हैं। काउंसलिंग, योग और ध्यान के अलावा मरीजों की रुचि के कार्यक्रम कराए जाते हैं। उन्हें परिवार की अहमियत का अहसास कराया जाता है। जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सक डाॅ. पवन कुमार से कंसल्ट करके दवा दी जाती है। एक माह से लेकर तीन माह तक के कोर्स हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें हर साल सरकार की ओर से 32 लाख रुपये की ग्रांट मिलती है। उसमें कर्मचारियों की सेलरी से लेकर केंद्र का सभी खर्च चलता है। मगर इस साल जनवरी माह से सरकार की ओर से एक भी पैसा नहीं आया है। इससे कर्मचारियों को परेशानी उठानी पड़ रही है। उन्होंने बताया कि उन्हें फिलहाल बाल कल्याण परिषद की ओर से मदद उपलब्ध कराई जा रही है। इसमें यहां भर्ती मरीजों के लिए भोजन व दवाइयों का खर्चा निकल जाता है।

यहां 18 लोगों का स्टाफ
नशा मुक्ति केंद्र में 18 लोगों के स्टाफ की पोस्ट है। इनमें एक प्रोजेक्टर कोर्डिनेटर, साइक्लॉजिस्ट, काउंसलर, डॉक्टर, अकाउंटेंट, दो नर्स, तीन वार्ड ब्वॉय, दो चौकीदार, एक सहकर्मी शिक्षक, हाउस किपिंग, कुक सहित 15 लोगों का स्टाफ है। इसके अलावा दो नर्स व योग थैरेपिस्ट की पोस्ट खाली पड़ी है।
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1995 से हुई थी परामर्श केंद्र के तौर पर शुरुआत
यह नशा मुक्ति केंद्र वर्ष 1995 से परामर्श केंद्र के तौर पर शुरुआत हुआ था। इसके पश्चात वर्ष 2001 में इसे 15 बिस्तरों के अस्पताल में परिवर्तित कर दिया गया। यहां पर न सिर्फ मरीजों को परामर्श दिया जाता है, बल्कि उनके रहने व खाने की भी पूरी व्यवस्था है। परियोजना निदेशक के अनुसार नशीले पदार्थों के सेवन से पीड़ित व्यक्ति को पारिवारिक एवं सामाजिक अलगाव और लोगों की उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। इससे निश्चित रूप से उन्हें मानसिक और शारीरिक कष्ट एवं आघात पहुंचता है। इससे उनका और उनके परिवार का जीवन दयनीय और कठिन बन जाता है।
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