कोसली। आधुनिकता की चकाचौंध में जहां पारंपरिक त्याेहारों की रंगत फीकी पड़ती नजर आ रही है वहीं कोसली के लोग आज भी करीब 800 वर्ष पुरानी होली गायन की परंपरा को जीवित रखे हैं। ढोल-नगाड़ों और डफली की थाप पर नाचते-गाते ग्रामीणों का उत्साह देखते ही बनता है। फाग का यह पर्व क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है।
बताया जाता है कि यह परंपरा करीब 800 वर्ष पूर्व गांव नठेड़ा से शुरू हुई थी। महाशिवरात्रि के पावन पर्व से होली गीतों का दौर आरंभ होता है और फाग के दिन कोसली स्थित बाबा मुक्तेश्वर पुरी धाम के चबूतरे पर इसका विधिवत समापन होता है। क्षेत्र के 13 गांवों के लोग इस अवसर पर गांवों से ढोल-नगाड़ों के साथ पैदल मार्च करते हुए मठ तक पहुंचते हैं।
वहां सामूहिक रूप से पारंपरिक होली गीत गाए जाते हैं और बाबा मुक्तेश्वर पुरी की पूजा-अर्चना के साथ कार्यक्रम संपन्न होता है। होली के अवसर पर कोसली मठ में मेले जैसा दृश्य बन जाता है। हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली से हजारों श्रद्धालु यहां आते हैं। श्रद्धालु मन्नत मांगते हैं, बच्चों का मुंडन संस्कार करवाते हैं और नवदंपतियों के गठजोड़े की रस्म अदा की जाती है। इसके अलावा मेले में खेल प्रतियोगिताएं और दंगल भी आयोजित होते हैं।
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दशकों पुराने बही-खाते में दर्ज होता है चढ़ावा
बकौल नंबरदार होशियार सिंह ऐसा कहा जाता है कि सदियों पहले एक डाकू ने साथियों के साथ गांव पर हमला किया था। ग्रामीणों ने मुकाबला करते हुए डाकुओं के सरदार को मार गिराया। उसी विजय की स्मृति में फाग के दिन ठाकुर की प्रतिमा को सजाकर चौपाल से मठ तक लाया जाता है। मेले में प्राप्त चढ़ावे का हिसाब आज भी लगभग 800 वर्ष पुराने बही-खाते में दर्ज किया जाता है, जो इस परंपरा की ऐतिहासिकता को दर्शाता है।
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मठ पहुंचते हैं क्षेत्रीय लोग
गुजरवास निवासी महावीर दायमा का कहना है कि आधुनिक युग में भी इस परंपरा को उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया जा रहा है जिसे देखने और सुनने के लिए इलाके के लोग मठ में पहुंचते हैं।
सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का माध्यम है
भाकली बी निवासी रमेश कुमार के अनुसार 800 साल पुरानी यह परंपरा क्षेत्र की पहचान बन चुकी है। फाग का यह उत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि क्षेत्र की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर को भी सहेजने का माध्यम बना हुआ है।
आज भी गीत पुरानी शैली में गाए जाते हैं
होली गायन मंडली के सदस्य जाहिदपुर निवासी थावर सिंह बताते हैं कि आज भी गीत उसी शैली में गाए जाते हैं जैसे सदियों पहले गाए जाते थे। नई पीढ़ी भी पूरे उत्साह के साथ इस विरासत को आगे बढ़ा रही है।
रमेश कुमार
रमेश कुमार
रमेश कुमार