रेवाड़ी। कोरोना महामारी की मार में अनेक बच्चों के सिर से माता-पिता का साया छीन गया। जिले के गांव डहीना निवासी दो बेटियों की इकलौता सहारा 40 वर्षीय सुनीता भी 6 मई को असमय कोरोना का ग्रास बन गई। इससे दोनों के सामने विकट स्थिति खड़ी हो गई। अब इन दोनों को सरकार की मदद की दरकार है। मां की कमी कोई भी मदद पूरा नहीं कर सकती है, लेकिन संकट की इस घड़ी में सहारा जरूर बन सकती है।
परिजनों से मिली जानकारी के अनुसार जिले के गांव डहीना निवासी सुनीता के पति चार साल पहले ही चल बसे थे। 17.5 वर्षीय 12वीं कक्षा में पढ़ रही हेमलता व साढ़े आठ साल की तीसरी कक्षा में पढ़ रही वर्षा के लालन-पोषण का जिम्मा पूरी तरह से मां पर निर्भर था। तीन मई को कोविड पॉजिटिव आने व तबीयत बिगड़ने के बाद सुनीता को रेवाड़ी नागरिक अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन यहां पर 6 मई को सुनीता ने दम तोड़ दिया। सुनीता के निधन से दोनों बच्चों पर विपदा का पहाड़ टूट गया। दादा-दादी पहले चल बसे हैं, अब दोनों बच्चे चाचा-चाची के पास रह रहे हैं।
माता-पिता की कमी का नहीं विकल्प, सहारा जरूर
माता-पिता का आशीर्वाद ही बच्चों के लिए आगे बढ़ने के लिए काफी होता है, जीवन की यात्रा में जब दोनों ही बीच में चल बसे तो स्थिति बेहद दुखदायी होती है। ऐसे बच्चों को ही सहारा देने के लिए सरकार की योजना कुछ हद तक कारगर हो सकती है। क्योंकि पढ़ाई से लेकर आगे बढ़ने के लिए प्रत्येक कदम पर मदद की जरूरत होगी। ऐसे में सही मायनों ऐसे बच्चों की सरकारों को सही समय पर मदद करनी चाहिए, ताकि दुख के पहाड़ पर कुछ मरहम लगाई जा सके।