सूरजकुंड मेले में नाटक राजा की रसोई प्रस्तुत करते रेवाड़ी के कलाकार। स्रोत: स्वयं
रेवाड़ी। सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेले में रेवाड़ी के कलाकारों ने राजा की रसोई नाटक का जीवंत मंचन कर दर्शकों को भाव विभोर किया। इस नाटक में भ्रष्टाचार पर प्रहार किया गया है।
कला एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग हरियाणा की ओर से प्रदेश से 18 नाटकों का चयन किया गया। इसमें रेवाड़ी की संस्था भरतमुनि कला केंद्र को राजा की रसोई नाटक के मंचन के लिए आमंत्रित किया गया। विभाग की कला अधिकारी रेणु हुड्डा व सुमन दांगी मुख्य रूप से उपस्थित रहीं। संस्था के प्रधान मदन डागर द्वारा निर्देशित व मोहन महर्षि द्वारा लिखित नाटक राजा की रसोई व्यंगात्मक नाटक है जो देश में व्याप्त भ्रष्टाचार व कानून व्यवस्था पर व्यंग्य है। इस नाटक में दिखाया गया है कि कैसे एक राजा अपनी सत्ता का दुरुपयोग कर प्रजा का शोषण करता है। इस नाटक में सत्ताधीशों के द्वारा जनता का शोषण दिखाया गया है। राजा के सत्ता प्राप्त करने के बाद जब वह अपना उपवास तोड़ता है तो राज रसोइया नरमांस परोसता है। वह मांस उसे इतना पसंद आता है कि ववह राज रसोइए को इस बंधन में बांध देता है कि प्रति दिन आज ही के जैसा मांस पकाना होगा। प्रतिदिन रसोइया नगर से एक व्यक्ति को मारकर मांस परोस देता है। एक समय ऐसा आता है जब रसोइए की अंतरात्मा इस कार्य को करके खुद से घृणा करने लगता है फिर राजा द्वारा रसोइए को भी भ्रष्टाचार रूपी मांस खिला दिया जाता है। अंत में एक ब्राह्मण द्वारा राजा और रसोइए का ये भेद सारे नगर के सामने खोल दिया जाता है। ब्राह्मण और नगर की जनता द्वारा रसोइए की अंतरात्मा को चेतना में लाकर राजा के विरुद्ध रसोइए को खड़ा कर दिया जाता है। इस नाटक में राजा की भूमिका में डॉ. अंकुर खेर, पकानक की भूमिका में ललित वर्मा, पकानक की पत्नी की भूमिका में हिमानी, राहगीर की भूमिका में आर्यन, कसाई कशिश बत्रा, आत्मा की भूमिका में तान्या, ब्राह्मण की भूमिका में पंकज तथा कोरस में गुलशन, संजय, आंचल, रितिक, आजाद, प्रताप, गौरव व आरव रहे।