संवाद न्यूज एजेंसी
रेवाड़ी। शहर के सिविल अस्पताल की मनोरोग ओपीडी में एक माह में ऑटिज्म से पीड़ित करीब 25 बच्चे आ चुके हैं। चिकित्सक के अनुसार इस बीमारी की पहचान अगर शुरुआती दौर में हो गई तो इसका इलाज किया जा सकता है। अधिक देर से इलाज कराने पर चुनौतियां आ सकती हैं।
मनोरोग विशेषज्ञ के अनुसार ऑटिज्म न्यूरो डेवलपमेंट डिसऑर्डर है। यह जन्म से ही आती है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें लोग दूसरों के साथ बातचीत करने, सीखने और व्यवहार करने में चुनौतियों का सामना करते हैं।
जरूरी है कि पैरेंट्स अपने बच्चों में होने वाले व्यवहार व लक्षण को पहचान कर समय पर इलाज कराएं। देरी करने पर इसके इलाज में चुनौतियां आ सकती है।
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. पवन कुमार ने बताया कि कुछ बच्चे या बड़े लोग बाकी से थोड़ा अलग होते हैं। उनकी बातचीत का तरीका अलग होता है और वे कई बार अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं। इसको ही ऑटिज्म कहते हैं।
ऑटिज्म बीमारी नहीं, बल्कि एक न्यूरोलॉजिकल कंडीशन है, जो व्यक्ति के संचार और सामाजिक कौशल को प्रभावित कर सकती है। डॉ. पवन कुमार ने बताया कि ऑटिज्म कोई बीमारी नहीं है। इसके लक्षण पहचान कर हम थैरेपी करा सकते हैं। कुछ दवाइयां भी दी जा सकती हैं।
इसमें उचित शिक्षा, थैरेपी और व्यवहारिक हस्तक्षेप से बच्चों के विकास और संचार में सुधार किया जा सकता है। स्पीच थैरेपी, व्यवसायिक थैरेपी और शारीरिक थैरेपी फायदेमंद हो सकती है।
ऑटिज्म के लक्षण
इसके लक्षण आमतौर पर जीवन के पहले दो वर्षों में दिखाई देते हैं। इसका निदान किसी भी उम्र में किया जा सकता है। इसके आनुवंशिक कारण भी हो सकते हैं। बच्चा माता-पिता से प्यार नहीं जता सकता। आई कांटेक्ट नहीं बनाते। इनमें एक स्किल खास होती है, जिसे अभिभावक पहचान कर उसे कॅरियर बनाने में डेवलप कर सकते हैं।