माई सिटी रिपोर्टर
पानीपत। डाइंग उद्योग को सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का शोधित पानी अब तक नहीं मिल पाया है। उद्यमी करीब 15 साल से इस पानी की मांग कर रहे हैं। जबकि नगर निगम सिवाह गांव स्थित एसटीपी पर करीब 30 एमएलडी पानी हर रोज शोधित कर नाले में छाेड़ रहा है। ऐसे में उद्यमी अपने स्तर पर पानी का प्रबंधन करने को मजबूर हैं।
डाइंग सेक्टर 2002 में काटा था। इस सेक्टर को विकसित करने के दौरान डाइंग उद्यमियों को हर संभव सुविधा देने का भरोसा दिया था। डाइंग उद्योग शिफ्ट होने लगा तो सेक्टर छोटा पड़ गया। अब भी शहर में डाइंग उद्योग हैं। वहीं सेक्टर में बसाए डाइंग उद्योग में भी पर्याप्त सुविधा नहीं मिल पाई हैं। सबसे बड़ी जरूरत पानी की है। इस उद्योग को अब तक पूरा पानी नहीं मिल पाया है।
उद्यमी संजीव अरोड़ा ने बताया कि डाइंग उद्योग की सबसे बड़ी जरूरत पानी है। यह पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पा रहा है। वे इसके लिए अधिकारियों से मिल चुके हैं। अब तक पानी की मांग पूरी नहीं हो पाई है।
दर्पण चावला ने बताया कि एसटीपी का पानी हर रोज शोधित कर नाले में डाल दिया जा रहा है। जबकि डाइंग उद्यमी इस पानी के लिए लगातार मांग कर रहे हैं। वे इसके बदले पैसे देने को भी तैयार हैं। अधिकारी इसके लिए काम करने को तैयार नहीं हैं।
रामप्रताप ने बताया कि डाइंग उद्योगों की बड़ी मांग पानी है। सरकार जेडएलडी प्रोजेक्ट नहीं ला पाती है तो एसटीपी का पानी डाइंग उद्यमियों की ट्रीट कर दिया जाए। इसका प्रोजेक्ट भी इतना बड़ा नहीं है।
डायर्स एसोसिएशन के प्रधान नितिन अरोड़ा ने बताया कि कि सिंचाई विभाग से पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। वे एसटीपी के शोधित पानी की लगातार मांग कर रहे हैं। यह अब तक नहीं मिल पाया है।
प्रेम छाछड़ा ने बताया कि डाइंग उद्योग पानीपत की दूसरी इंडस्ट्री का आधार है। इसकी जरूरत पूरा करना जरूरी है। इसके बिना उद्योग चला पाना मुश्किल हो जाएगा। डाइंग उद्योग को समय पर पूरा पानी दिया जाना चाहिए।
उद्यमी भारत बांगा ने बताया कि डाइंग उद्योग पानी पर आधारित है। पानी नहीं मिलने पर बोरबेल का सहारा लेना पड़ता है। भूजल को बचाने के लिए सरकार के स्तर पर पानी का प्रबंध किया जाना चाहिए। एसटीपी का पानी डाइंग यूनिट में प्रयोग किया जा सकता है।
डाइंग उद्योग को नियमानुसार पानी दिया जा रहा है। उनकी पानी की सप्लाई बढ़ाने की मांग आई हैं। वे अपने स्तर पर पानी की मात्रा नहीं बढ़ा सकते।
सुरेश कुमार, एक्सईएन, सिंचाई विभाग।