पानीपत। पिता जिले सिंह और चाचा मांगेराम पुराने समय में पशुओं चारा खिलाने के लिए जंगल में लेकर जाते थे। यहां पर खाली समय में खूब खेलते थे। धीरे-धीरे गांवों में सर्कल (लंबी) कबड्डी खेलने लगे और उनका क्षेत्र में नाम हो गया। वे सर्कल कबड्डी के नामी खिलाड़ी बन गए। उनके नक्शे कदम पर जिले सिंह का बेटा राजेश मलिक उर्फ शेरनी चला। राष्ट्रीय स्तर पर कबड्डी में नाम चमकाया। पिछले दिनों गोवा में आयोजित मास्टर वर्क की सीनियर नेशनल में रजत पदक जीता। शेरनी मलिक अब अपना भविष्य युवा पीढ़ी में देख रहे हैं। वे राजा खेड़ी गांव में एकेडमी में युवाओं को कबड्डी की बारीकी सीखा रहे हैं।
राजेश मलिक उर्फ शेरनी मलिक ने बताया कि उनके पिता जिले सिंह और चाचा मांगेराम फुर्ती से भरे हुए थे। ग्रामीणों का कहना है कि वे जंगल हिरन और हिरनी को भी पकड़ लेते थे। उनको देखकर उनके मन में भी बचपन में कबड्डी को लेकर रुझान बनने लगा। वह शुरू से ही कबड्डी खेलने लगा। इसके साथ क्रिकेट और दूसरे खेलों में भी आगे रहता है। उनको इनमें कबड्डी सबसे अच्छा लगा। उसकी 14 साल की उम्र में उसके पिता का निधन हो गया। एक तरह से उसका कबड्डी में आगे आने का सपना टूट सा गया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने स्कूल स्तर पर बेहतर खेल का प्रदर्शन किया और स्कूली नेशनल तक खेला। वह कबड्डी खेलते समय दूसरे खिलाड़ियों के ऊपर से कूदकर प्वाइंट ले आता था। स्कूली प्रतियोगिता में एक बार एक कोच ने उनकाे शेरनी कहकर पुकारा। उस दिन के बाद उसको गांव में शेरनी मलिक के नाम से भी जानने लगे। इस बीच रेलवे में नौकरी का प्रयास किया, लेकिन उसका सपना पूरा नहीं हुआ। उन्होंने अपने खेल के साथ गांव में एकेडमी बनाकर युवाओं को कबड्डी में तैयार करना शुरू कर दिया। उसकी उम्र अब करीब 37 वर्ष है।
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अपने बेटे को भी कबड्डी में उतारा
राजेश मलिक ने बताया कि उनके परिवार की तीसरी पीढ़ी कबड्डी के मैदान पर है। वह अपने 10 वर्षीय बेटे यश मलिक को कबड्डी के गुर सिखा रहा है। वह अंडर-11 में दो बार राज्य स्तर पर खेल चुका है। उसके कबड्डी खेलने का तरीका भी अलग है।