पंचायत चुनाव में सरकार की ओर से जारी निर्देशों के बाद चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को पसीने आते नजर आ रहे हैं।
उम्मीदवार कभी बैंकों के चक्कर तो कभी बिजली विभाग के चक्कर लगा रहे हैं। इन दिनों बैंकों और सरकारी कार्यालयों में आम लोगों से ज्यादा पंचायत चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी नजर आ रहे हैं।
सरपंच और पंच पद के दावेदारों के लिए तय की शर्तों में केवल प्रत्याशी को सहकारी समितियों की ओर से संचालित बैंकों से एनओसी लेने की शर्त को लागू करना जल्दबाजी कहा जा सकता है। क्योंकि प्रदेश में सहकारी बैंकों की तुलना में सरकारी और अन्य बैंकों के डिफाल्टरों की संख्या केेे कई गुना अधिक हैं।
जो सरकार के बेदाग छवि की पंचायत चुनाव कराने के सपने को धूमिल करने के लिए काफी है।
पंचायत चुनाव को लेकर सरकार की ओर से तय शर्तों में एक शर्त सहकारी समितियों ने संचालित बैंकों से एनओसी (नो ड्यूज सर्टिफिकेट) जमा करवाने की भी है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में को-ऑपरेटिव बैंकों की तुलना में डिफाल्टरों की संख्या अन्य बैंकों में ज्यादा है।
सहकारी बैंक तो केवल किसानों तक सीमित हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र की करीब 40 प्रतिशत जनसंख्या का खेती से कोई सरोकार नहीं है। वे तो बिजनेस और मेहनत मजदूरी से गुजर बसर करते हैं। इनका लेन देन सहकारी बैंकों के बजाय, सरकार और अन्य बैंकों से अधिक है।
बैंकों के पास ऐसे हजारों उपभोक्ताओं की लाखों के डिफाल्टिंग अमाउंट की सूची है। लेकिन सरकार की ओर से केवल को-ऑपरेटिव बैंक से एनओसी लेने की शर्त काफी हद तक अनुचित है।
वहीं, सरकार के इस फैसले से सहकारी समितियों के बैंकों को उनका बरसो पुराना डूबा रुपये मिलने का इंतजार है और अन्य बैंकों की प्रबंधक कमेटियों में सरकार के इस निर्णय के प्रति गहरा रोष है।
सहकारी समितियों की ओर से संचालित बैंकों को पंचायती चुनाव से पहले काफी हद तक अपने डूबे रुपये की रिकवरी की आस है।
बैंक अधिकारी बरसों पहले डूबे रुपये की रिकवरी के लिए एक बार फिर पुराने खातों की टोह ले रहे हैं। सरकार की ओर से इस शर्त में केवल प्रत्याशी ही नहीं उसके मात पिता को भी शामिल किया है।
यदि प्रत्याशी के माता पिता पर भी बैंक लोन मिला तो बैंक रिकवरी के बिना उसका नो ड्यूज सर्टिफिकेट जारी नहीं करेंगे।