संवाद न्यूज एजेंसी
सावन का महीना आते ही बुजुर्ग से लेकर बच्चों तक में उत्साह देखने को मिलता था। महिलाएं सावन में हरे-लाल रंग को प्राथमिकता देती थीं। सावन की कोथली में बेटी को मायके से बड़े बतासे और फिरनी भेजी जाती थी। बतासे और फिरनी की जगह अब मट्ठी, बिस्किट और घेवर ने ले ली है। बतासे और फिरनी तो अब कहीं-कहीं देखने को मिलते हैं। समय के साथ लोगों का एक-दूसरे से मेल-जोल भी कम होने लगा है।
पहले कोथली में घेवर, बड़े बतासे, बड़े बिस्किट और फिरनी मुख्य रूप से होती थी लेकिन लोग अब रीति-रिवाजों और परंपराओं को नाममात्र निभा रहे हैं और कोथली की परंपरा को पूरा करने के लिए कोथली में घेवर के साथ मट्ठी या छोटे पैकेट वाले बिस्किट ही दे रहे हैं। यह सिर्फ कोथली न होकर मायके से भेजा गया बेटी के लिए प्यार होता था। समय के अनुसार सब बदल रहा है। सावन की रौनक ही कम होने लगी है। सिर्फ महाशिवरात्रि और तीज तक सावन के महीने के रौनक दिखाई देती है। तीज जाते ही मानो सावन का महीना ही खत्म हो गया हो।
- कृष्णा देवी (55), परढ़ाना गांव
आधुनिकता में रीति-रिवाज छूट रहे पीछे
पहले पूरे सावन में लोग झूले-झूलते थे। महिलाएं एक-दूसरे के घर जाकर कोथली का सामान देती थीं और आपसी मेल-जोल को बढ़ाती थी लेकिन अब सब अपने घरों तक सीमित रहने लगे हैं। लोग अपने घरों में ही पकवान, मिठाई बना खा लेते हैं। पहले लोग मिठाई, पकवान बनाकर एक-दूसरे को बांटकर खाते थे। ऐसा करने से भाईचारा बढ़ता था और आपसी मेल उत्पन्न होता था। आधुनिकता आने से लोग परंपराओं और रीति-रिवाजों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं।
वंदना सिंगला (40), एल्डिको