समय के साथ लोगों की सोच व उनके काम करने व रहन सहन के तरीके बदल रहे हैं। धार्मिक कार्य करने का स्वरूप भी बदल रहा है। पहले सावन के महीने में लोग शिवरात्रि पर पैदल कांवड़ लेकर आते थे लेकिन समय के साथ कांवड़ लाने का तरीका बदल गया है। पैदल कांवड़ का प्रचलन खत्म होने लगा है। वर्तमान समय में लोग डाक-कांवड़, झूला कांवड़, भोले बाबा की तस्वीर लेकर आने का प्रचलन बढ़ने लगा है।
सेक्टर-24 की 55 वर्षीय डॉ. अर्चना गुप्ता ने बताया कि वर्तमान समय में लोग धार्मिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं लेकिन समय के साथ तरीका बदल रहा है। मैं बचपन से देखती आ रही हूं कि पहले लोग शिवरात्रि पर पैदल कांवड़ लेकर आते थे। धीरे-धीरे लोगों ने कांवड़ लाने का तरीका बदल दिया है। कांवड़ अब पहले से ज्यादा लेकर आते हैं। पैदल कावड़ की जगह डाक-कावड़, झूला कावड़ ने ले ली है। लोग ज्यादातर डाक-कावड़ लेकर आ रहे हैं इसलिए समय के साथ सब बदल रहा है।
अब महिलाएं भी लाने लगीं कांवड़
वर्तमान में महिलाओं के साथ पुरुष भी धार्मिक कार्य उत्साह के साथ कर रहे हैं। जहां सावन के पूरे महीने महिलाएं शिवालयों में जाकर जलाभिषेक कर रही हैं तो पुरुष शिवरात्रि के लिए हरिद्वार से कांवड़ लेकर आ रहे हैं। अब ज्यादा डाक-कांवड़, झूला कांवड़ और भोले बाबा की तस्वीर लेकर आ रहे हैं। समय के साथ लोगों का बस धार्मिक कार्य करने का तरीका बदला है बाकी धार्मिक कार्य लोग पहले से ज्यादा उत्साह से कर रहे हैं।
डॉ. पूजा मेंहदीरता (40), सेक्टर 13-17