खेल की शुरुआत करने के तीन महीने बाद ही नीरज के पिता सतीश ने उनको 7 हजार रुपये का पहला भाला दिलाया था। जो एल्युमिनियम मिक्स था। नीरज के अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए नीरज ने अपना दूसरा भाला लगभग 50 हजार रुपये का लिया था। अब नीरज डेढ़ लाख रुपये के भाले से अभ्यास करते हैं।
मुकाबले में दो बार ज्यादा दूर भाला न जाने पर पिता बोले- कोई बात नहीं
मुकाबला देखने के दौरान दो बार 80 मीटर से नीचे भाला रह जाने पर नीरज के पिता ने कहा कि कोई बात नहीं। टोक्यो में खेल रहे नीरज को गांव खंडरा से ही प्रोत्साहित किया गया। पिता को देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे वे अपने बेटे के साथ खड़े होकर उसमें जोश भर रहे हों। वहीं मैच देखने के दौरान कई बार खुशी से नाचते तो कई बार मन्नतें मांगते दिखे।
ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर नीरज चोपड़ा ने पिता सतीश चोपड़ा का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। नीरज के पिता और किसान सतीश चोपड़ा ने कहा कि चार साल पहले राष्ट्रमंडल खेलों के बाद सब बदल गया। राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण और जूनियर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के बाद से गांव खंडरा के नाम से कम और नीरज का गांव कहकर ज्यादा जाना जाता है।
लोग कहते हैं कि नीरज के गांव जाना है। अब ओलंपिक में स्वर्ण पदक लाकर नीरज ने गांव का नाम पूरे भारत में प्रसिद्ध कर दिया है। अब देश के लोग खंडरा को नीरज के नाम से जानेंगे। इससे ज्यादा खुशी और क्या हो सकती है। चाचा भीम चोपड़ा ने कहा कि जब तक हमने नीरज को पाला तब तक हमारा बेटा था, अब ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के बाद वह पूरे देश का बेटा हो गया है।
गांव में आने पर मुंह मीठा करा करूंगा पोते का स्वागत: दादा
दादा धर्मवीर सिंह चोपड़ा ने कहा कि गांव आने पर अपने पोते का भव्य स्वागत करेंगे। मेरे पोते ने पूरे देश का नाम रोशन किया है। मुझे अपने पोते पर विश्वास था कि वह एक दिन देश का नाम जरूर रोशन करेगा।