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Panipat News: आईआईटी मद्रास जिले में बचा रहा घायलाें की जान

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पानीपत। टेक्सटाइल नगरी में हर साल 600 से अधिक व्यक्तियों की सड़क हादसे में मौत हो जाती है। पानीपत से हर रोज दो लाख से अधिक वाहन गुजरते हैं। सबसे अधिक हादसे हाइवे पर होते हैं। इन हादसों के कारणों के अध्ययन का जिम्मा आईआईटी मद्रास को दिया गया था।
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आईआईटी मद्रास ने पानीपत में एक माह तक अध्ययन किया। अध्ययन में सड़क हादसों के पांच हॉट स्पॉट चिह्नित किए गए। इन स्पॉट के पास के निजी अस्पतालों के संचालकों से बैठक की गई ताकि हादसे होने पर यहां से तुरंत एंबुलेंस भेजी जा सके। प्रशासन का यह प्रयास सार्थक साबित हुआ। चार माह में प्रशासन के इस प्रयास से लगभग 520 घायलों की जान बची है। इस प्रोजेक्ट को आई रेड आईडा नाम दिया गया है।

आईआईटी मद्रास ने जून के प्रथम माह में पानीपत में सड़क हादसों पर अध्ययन शुरू किया था। अध्ययन में पाया गया कि टोल प्लाजा क्रॉस करते ही अवैध कट जहां वाहन चालक सेक्टर 18 की ओर टर्न लेते हैं, खादी आश्रम के सामने बना नया कट, चौटाला रोड जहां जीटी रोड पर मिलता है, नगीना हाइवे पुल यहां जीटी रोड पर सिवाह के पास मिलता है, सनौली नाका के पास सबसे अधिक सड़क हादसे होते हैं। यहां कई टेक्निकल कमियां है। जहां सड़क हादसे होते हैं। इस अध्ययन के बाद आईआईटी मद्रास ने अपनी रिपोर्ट डीसी डॉ. वीरेंद्र दहिया को सौंपी थी। इस रिपोर्ट को रोड सेफ्टी की बैठक में रखा गया। सड़क हादसों में घायल लोगों की जान बचाने के लिए सिविल सर्जन को प्लानिंग पर काम करने के निर्देश दिए गए।
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सिविल सर्जन ने इन पांचों हॉट स्पॉट के पास स्थित निजी अस्पतालों के डॉक्टरों से बैठक की। बैठक में तय हुआ कि जब भी कोई सड़क हादसा होता है तो स्वास्थ्य विभाग के पास कॉल आती है। इस कॉल पर स्वास्थ्य अधिकारी निजी अस्पतालों में कॉल कर मौके पर उनकी एंबुलेंस को भेजने के निर्देश देंगे। इसी अनुसार काम शुरू हुआ और सड़क हादसों पर तुरंत एंबुलेंस पहुंचने लगी। घायलों को गोल्डन हॉवर्स में इलाज मिला और इन चार माह में लगभग 520 लोगों की जान बचाई गई।



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घायल के इलाज का खर्च प्रशासन दे रहा
इन प्रोजेक्ट के तहत घायलों को तुरंत निजी अस्पताल में दाखिल कराया जाता है। उनका इलाज शुरू किया जाता है। जब तक घायलों के स्थिति स्थिर नहीं हो जाती। तब तक इलाज खर्च भी प्रशासन ही उठा रहा है।

वर्जन-
जिला सिविल सर्जन डॉ. जयंत आहूजा ने बताया कि सड़क हादसे में घायल लोगों के लिए गोल्डन ऑवर सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। अगर उस दौरान घायल को इलाज मिल जाए तो उसके बेचने की संभावना बेहद अधिक होती है। घायल को जिला नागरिक अस्पताल में लाने में समय लगता है इसलिए उन्हें नजदीकी निजी अस्पताल में लाया जाता है और उनका इलाज शुरू होता है। चार माह में 500 से अधिक घायलों की जान बची है।
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