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गुरु ही पूर्ण, मां बच्चे की पहली गुरु : राधे-राधे महाराज

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पानीपत। प्रसिद्ध कथावाचक पंडित राधे-राधे महाराज ने कहा कि गुरु ही पूर्ण होते हैं, इसलिए वे गुरु पूर्णिमा के दिन ही आते हैं। मां प्रथम गुरु कहलाती हैं। क्योंकि वही इस समाज में लाने वाली होती है और समाज के नाते रिश्ते मां से ही प्रारंभ होते हैं।
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उन्होंने ये बात हरिनगर में रविवार को श्रीमद्भागवत कथा का गुणगान करते हुए कही। उन्होंने कहा कि गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जाते हैं। इस धरा पर आने के बाद हमें परमात्मा के चरणों का रास्ता बताने वाला सच्चा गुरु होता है। गुरु भक्ति परमात्मा की भक्ति से श्रेष्ठ मानी गई है। ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। उन्होंने कहा कि भक्ति करने का रास्ता हमें गुरु ही दिखा सकते हैं और जब तक हम भक्ति नहीं करेंगे तो परमात्मा की प्राप्ति असंभव है। इसलिए परमात्मा की प्राप्ति के लिए निश्चित तौर पर किसी गुरु की आवश्यकता पड़ेगी और वही गुरु परम ब्रह्म कहलाता है। शास्त्र कहते हैं कि गुरु गोविंद से बड़े हैं, क्योंकि गोविंद को मिलाने वाले गुरु होते हैं। इसलिए गुरु के प्रति सच्ची निष्ठा व आस्था रखना ही भगवान की भक्ति है। उन्होंने कथा में गोवर्धन पूजा की और छप्पन भोग प्रसाद लगाया गया। राधे राधे महाराज ने कहा कि प्रसाद का निरादर भगवान के अपमान के सामान होता है। प्रसाद वितरण में मिला हुआ भाग स्वयं भगवान का जूठन होता है। उसको भाव से पाना चाहिए। प्रसाद को पूरा चखना चाहिए। इसको छोड़ना पाप के साथ दोष भी लगता है। इस अवसर मास्टर शिवकुमार, एडवोकेट कमल राणा, अजय बंसल, जोगिंद्र भट्ट, रामबंधु गुप्त, तिलकराज मिगलानी व ओमप्रकाश विरमानी मौजूद रहे।
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