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Panipat News: जब से कान्हा घर में आए मानो सब चिंता हो गई दूर

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बचपन में मैं अपनी मां के साथ मंदिर में जाकर पूजा और लोगों की सेवा करती थी। बड़ी हुई तो कान्हा की तरफ मेरा मन आकर्षित होने लगा। मैं भी बाल स्वरूप कान्हा लेना चाहती थी। शादी के बाद अपने पति से इस बारे में बात की तो उन्होंने मना कर दिया। कुछ साल बाद मैंने फिर से पति से इस बारे में बात की तो उनका फैसला तब भी वही था लेकिन फिर मैं जिद करके 10 साल पहले वृंदावन से बाल स्वरूप कान्हा को घर ले आई। कई दिन तो मेरे पति ने नाराजगी जाहिर की लेकिन कान्हा के प्रति मेरे सेवा भाव व श्रद्धा को देखकर वे भी धीरे-धीरे कान्हा को अपनाने लगे। अब वे कान्हा की सेवा मुझसे ज्यादा करते हैं। जब भी घर से बाहर जाती हूं वे ही कान्हा का ध्यान रखते हैं।
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जन्माष्टमी पर धनिया पंजीरी का लगाती हूं भोग
बाल स्वरूप कान्हा मंदिर में विराजमान रहते हैं। जन्माष्टमी मेरे व मेरे परिवार के लिए स्पेशल हैं क्योंकि इस दिन मैं पूरे दिन कान्हा का उपवास रखती हूं और उनका जन्मदिन मनाती हूं। कान्हा के लिए नई पोषाक, मनपसंद माखन, मिश्री, धनिया पंजीरी, खीर का भोग लगाती हूं। रात्रि 12 बजे केक काटकर उनका जन्मदिन मनाते हैं। रात को पहले कान्हा का अभिषेक करते हैं, पूजा करते हैं और फिर केक काटते हैं। जब से कान्हा घर में आए हैं तब से मानो सभी चिंता दूर हो गई हैं। ऐसा लगता है कि ठाकुर जी सब संभाल लेंगे।
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प्रस्तुति : कृष्ण मुथरेजा, पचरंगा बाजार निवासी
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