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हरियाणा: आरक्षण से जुड़े मामलों में फैसला लेते हुए इसके मूल उद्देश्य को ध्यान में रखना जरूरी: हाईकोर्ट

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चंडीगढ़। मेरिट में होने केबावजूद ओबीसी प्रमाणपत्र अपलोड न होने के चलते आवेदन रद्द करने के भारतीय नेवी के फैसले को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के मामलों में निर्णय लेते हुए आरक्षण के मूल उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिए। समाज की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय जरूरी है।
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भारत सरकार ने नेवी में ट्रेड्समैन मेट पद के लिए आवेदन मांगे थे। भिवानी के सुनील ने भी इस पद के लिए आवेदन किया था और परीक्षा भी पास की। सुनील को 86 अंक प्राप्त हुए जबकि ओबीसी श्रेणी में चयनित आखिरी आवेदक के अंक 75 थे। मेरिट में होने के बावजूद उसका चयन नहीं किया गया। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई और हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सुनील के हक में फैसला सुनाया। इसके खिलाफ भारत सरकार ने खंडपीठ में अपील दाखिल कर दी। खंडपीठ ने कहा कि याची ने जुलाई 2018 में आईटीआई कर ली थी। उसे 2017 में ओबीसी सर्टिफिकेट भी जारी किया गया था।
ऐसे में 2019 में जब उसने आवेदन किया तो वह आईटीआई भी था और ओबीसी के तौर पर आवेदन करने के लिए पात्र भी। हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रकार आवेदन पर फैसला लेते हुए आरक्षण के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। हाईकोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ ही भारत सरकार की अपील को खारिज करते हुए सिंगल बेंच के फैसले को कायम रखा। अब भारत सरकार को याची के आवेदन पर नए सिरे से गौर करना होगा।
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