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अदालत के प्रति अधिकारी गंभीर नहीं, आदेश में तत्काल का अभिप्राय भी नहीं समझते क्या: हाईकोर्ट

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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि वरिष्ठ पदों पर बैठे अधिकारी फोर्थविथ (तत्काल) जैसे शब्दों से अनभिज्ञता का बहाना नहीं बना सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायालय के आदेशों का तुरंत और गंभीरता से पालन करना चाहिए।
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जस्टिस विक्रम अग्रवाल झुलका कॉलेज ऑफ फार्मेसी एंड हेल्थ साइंसेज की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे जिसमें पंजाब स्टेट बोर्ड ऑफ टेक्निकल एजुकेशन पर डी फार्मा कोर्स की संबद्धता देने में देरी का आरोप था। अदालत ने बोर्ड के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा कि अधिकारी दिवाली समारोह में व्यस्त रहे जबकि उन्हें अदालत के आदेश पर युद्धस्तर पर कार्रवाई करनी चाहिए थी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक बहाने अदालती आदेश की अवहेलना को सही नहीं ठहरा सकते। कड़ी टिप्पणी के बावजूद हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि इस मामले में जानबूझकर अवज्ञा या अवमाननापूर्ण मंशा के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।
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केवल चार कार्यदिवस आदेश का पालन करने के लिए होने का तर्क हाईकोर्ट ने नामंजूर कर दिया। जरूरी कार्रवाई एक दिन में भी पूरी की जा सकती थी। कोर्ट ने बोर्ड को भविष्य में अपना रवैया सुधारने की सख्त हिदायत। कॉलेज ने डी फार्मा कोर्स की संबद्धता से इन्कार के आदेश को चुनौती दी थी।
17 अक्तूबर 2025 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कॉलेज के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया प्रमुख नियामक संस्था है और उसकी मंजूरी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने बोर्ड को आदेश दिया था कि वह तत्काल आवश्यक आदेश जारी कर कॉलेज को विद्यार्थियों के प्रवेश की अनुमति दे।
कॉलेज ने आरोप लगाया कि तत्काल निर्देश के बावजूद बोर्ड ने 28 अक्तूबर 2025 तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जबकि प्रवेश की अंतिम तिथि 30 अक्तूबर थी। देरी के चलते कॉलेज केवल दो विद्यार्थियों का ही पंजीकरण कर सका।
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