फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पत्नी के साथ रहने से इन्कार आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: हाईकोर्ट

विज्ञापन
विज्ञापन
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाना केवल शब्दों तक सीमित नहीं है बल्कि चुप्पी या लापरवाही भी कभी-कभी उकसावे का रूप ले सकती है। हालांकि, हर असहमति या दूरी को उकसावा नहीं माना जा सकता।
विज्ञापन


न्यायमूर्ति यशवीर सिंह राठौर ने यह टिप्पणी मनीका मित्तल और उनके परिवार के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए की। अदालत ने कहा कि पत्नी का अपने पति के साथ रहने से इन्कार करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता। यह मामला फाजिल्का जिले के अबोहर का है, जहां 13 अक्टूबर 2022 को एक एफआईआर दर्ज की गई थी।
इसमें मनीका मित्तल और उनके परिवार पर उनके पति साहिब सिंह को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया था। साहिब सिंह ने अपनी पत्नी से विवाद के बाद खुद को आग लगा ली थी। पुलिस ने एक हस्तलिखित नोट (28 मार्च 2022) भी बरामद किया था जिसमें मृतक ने अपने ससुराल पक्ष को परिवार बर्बाद करने के लिए दोषी ठहराया था।
विज्ञापन

अभियोजन पक्ष ने कहा कि पत्नी और उसके परिवार के लगातार इन्कार ने मानसिक प्रताड़ना दी जिससे साहिब सिंह ने आत्महत्या की। अदालत ने सभी तर्कों पर विचार करते हुए कहा कि पत्नी का वैवाहिक जीवन में लौटने से इन्कार अपने आप में अपराध नहीं बनता, जब तक कि स्पष्ट रूप से अपराध करने का इरादा साबित न हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का अर्थ जानबूझकर किए गए किसी कार्य, आचरण या मौन के माध्यम से भी हो सकता है। हर परिस्थिति को उकसावा नहीं कहा जा सकता। इस निर्णय से अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैवाहिक असहमति या दूरी को आत्महत्या के लिए उकसावा मानना कानून की गलत व्याख्या होगी।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें