चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने नशा तस्करी के मामले में कथित रूप से बरामद दो लाख रुपये की ड्रग मनी को छुपाने को लेकर सवाल उठाते हुए पुलिस की भूमिका पर संदेह जताया है। अदालत ने मामले की निष्पक्षता की रक्षा करते हुए संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध तीन महीने में जांच का गुरदासपुर के एसएसपी को आदेश दिया है।
जस्टिस मनीषा बत्रा ने आरोपी को जमानत प्रदान करते हुए पुलिस की कार्रवाई को आश्चर्यजनक करार दिया और कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि जब दो लाख रुपये की नकदी की बरामदगी का दावा किया गया था, तो उसे रिमांड आवेदन में क्यों नहीं दर्शाया गया और कोर्ट में जमा क्यों नहीं कराया गया। आरोपी ने दावा किया कि उसके पिता से पुलिस ने झूठे केस में फंसाने की धमकी देकर तीन लाख रुपये वसूले। इस दावे को समर्थन देते हुए बैंक स्टेटमेंट पेश किया गया, जिसमें एक ही दिन में नकद निकासी की प्रविष्टियां दर्ज थीं।
आरोपी के वकील ने अदालत को बताया कि पैसा देने के बावजूद आरोपी को रिहा नहीं किया गया। बल्कि जब उसके पिता ने शोर मचाया और विरोध किया, तब पुलिस ने 27 मार्च, 2024 को मजिस्ट्रेट के समक्ष एक आवेदन देकर यह दिखाने की कोशिश की कि आरोपी से दो लाख रुपये बरामद किए गए थे। कोर्ट ने पाया कि यह कथित बरामदगी 16 मार्च, 2024 की थी, लेकिन इसे कोर्ट को 11 दिन तक सूचित नहीं किया गया और न ही उक्त राशि कोर्ट में जमा की गई।
मजिस्ट्रेट ने भी अपने आदेश में यह टिप्पणी की कि जांच अधिकारी द्वारा यह धनराशि कोर्ट में प्रस्तुत नहीं की गई है। यह आश्चर्यजनक है कि इस महत्वपूर्ण तथ्य को रिमांड आवेदन में नहीं दर्शाया गया और कथित ड्रग मनी कोर्ट में जमा नहीं की गई। इससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर संदेह उत्पन्न होता है।
कोर्ट ने गुरदासपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया है कि वे पूरे प्रकरण की जांच कराएं और दोषी अधिकारियों के विरुद्ध उचित कार्रवाई करें। यह भी कहा गया है कि जांच तीन महीने की समय सीमा में पूरी हो जानी चाहिए।