आईडीएफसी फर्स्ट बैंक से जुड़े 590 करोड़ रुपये के घोटाले की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है।
जांच में सामने आया है कि कई मामलों में फर्जी डेबिट नोट, बैंक स्टेटमेंट और अन्य दस्तावेजों का इस्तेमाल कर सरकारी विभागों के खातों से रकम ट्रांसफर करवाई गई। कुछ बैंक रिकॉर्ड में हस्ताक्षर भी संदिग्ध पाए गए हैं। एसीबी के अनुसार आईडीएफसी फर्स्ट बैंक द्वारा प्रोसेस किए गए कुछ चेक और लेनदेन में राशि के अंकों और शब्दों में अंतर पाया गया, इसके बावजूद उन्हें पास कर दिया गया। जांच एजेंसी का मानना है कि यह पूरे घोटाले में गंभीर अनियमितताओं की ओर संकेत करता है।
जांच में यह भी सामने आया है कि सरकारी खातों से निकाली गई रकम को कई फर्मों और निजी खातों में ट्रांसफर किया गया। इनमें कुछ शेल कंपनियां और प्रोजेक्ट शामिल हैं जिनके माध्यम से रकम को आगे ट्रांसफर कर नकद में बदलने की आशंका है। सूत्रों के मुताबिक कुछ आरोपियों ने ज्वेलरी खरीद-बिक्री के नाम पर बिल बनाकर रकम को वैध दिखाने की कोशिश की और बाद में कमीशन काटकर नकद में बदल दिया।
मामले में गिरफ्तार राजन सिंह कटोदिया, राजेश सांगवान और रणधीर सिंह को रविवार को अदालत में पेश किया गया। अदालत ने तीनों आरोपियों को चार दिन के पुलिस रिमांड पर भेज दिया है ताकि उनसे पूछताछ कर पूरे नेटवर्क और पैसों के लेनदेन की कड़ियों को जोड़ा जा सके। वहीं एक अन्य आरोपी अंकुर शर्मा को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
जांच एजेंसी हरियाणा के कई सरकारी विभागों के खातों से हुए लेनदेन की भी जांच कर रही है। इनमें पंचायत एवं विकास विभाग, हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और नगर निगम पंचकूला के खातों से हुए ट्रांजेक्शन भी शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार मामला सरकारी धन के बड़े पैमाने पर गबन से जुड़ा हो सकता है। एसीबी की टीमें आरोपियों से पूछताछ कर पूरे नेटवर्क और पैसे के प्रवाह की कड़ियों को जोड़ने में जुटी हैं। जांच एजेंसी के मुताबिक आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां भी हो सकती हैं।