चंडीगढ़। फायरमैन भर्ती में पुरुष और महिला अभ्यर्थियों के लिए एक जैसे शारीरिक मानक तय करने पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि इस प्रकार तो महिलाओं को दिए गए आरक्षण के सांविधानिक उद्देश्य निष्प्रभावी हो सकता है। हाईकोर्ट ने अब महिलाओं के लिए आरक्षित पदों को अगली सुनवाई तक पुरुष उम्मीदवारों से भरने पर रोक लगा दी है। साथ ही राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
जस्टिस अनुपेंदर सिंह ग्रेवाल और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ के समक्ष पुष्पा रानी व अन्य की याचिका सुनवाई के लिए पहुंची थी। याची ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने फायरमैन के पदों के लिए जारी विज्ञापन में 33 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए हैं लेकिन शारीरिक दक्षता और फिटनेस से जुड़े मानक पुरुषों के समान ही निर्धारित कर दिए गए हैं। यह व्यवस्था व्यावहारिक रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत कठिन है और इससे आरक्षण का उद्देश्य ही समाप्त हो सकता है।
अदालत को बताया गया कि महिला उम्मीदवारों को एक मिनट में 60 किलोग्राम वजन उठाकर 100 गज दौड़ने, हुक लैडर को खड़ा करने, रस्सी या पाइप पर चढ़कर 8 से 10 फीट ऊंचाई तक पहुंचने जैसे कठिन परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार यह मानक महिलाओं की शारीरिक क्षमता के अनुपात में अत्यधिक कठोर हैं। शारीरिक दक्षता और फिटनेस पास न करने के चलते महिलाओं के लिए आरक्षित पद पर पुरुषों को नियुक्त करने का आदेश जारी कर दिया गया।
सुनवाई के दौरान यह भी दलील दी गई कि अर्धसैनिक बलों की भर्ती में भी महिलाओं के लिए शारीरिक मानकों में रियायत दी जाती है। उदाहरण के तौर पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, असम राइफल्स, एनआईए और एसएसएफ में पुरुष उम्मीदवारों को जहां 5 किलोमीटर दौड़ पूरी करनी होती है, वहीं महिला उम्मीदवारों के लिए यह दूरी 1.6 किलोमीटर निर्धारित है। इन तथ्यों पर गौर करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए एक समान शारीरिक मानक लागू किए जाते हैं तो महिलाओं को दिया गया आरक्षण प्रभावहीन हो सकता है।