चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विभागीय अपील लंबित रहने के दौरान कर्मचारी की मौत से उसकी अनुशासनात्मक सजा समाप्त नहीं होती। अदालत ने कहा कि केवल मृत्यु के आधार पर पहले से लगाई गई सजा को निरस्त नहीं माना जा सकता।
यह मामला पूर्व कर्मचारी एमएस चीमा से जुड़ा है। चीमा पंजाब स्टेट कोऑपरेटिव सप्लाई एंड मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड (मार्कफेड) में शाखा अधिकारी थे। मामला वर्ष 1997-98 में धान के स्टॉक में कमी का था। धान बनूड़ स्थित एनजीटी राइस मिल में रखा गया था। विभागीय जांच में स्टॉक की उचित सुरक्षा में लापरवाही सामने आई थी। हालांकि, जांच में गबन या हेराफेरी सीधे तौर पर साबित नहीं हुई थी।
याचिका और अदालत का फैसला :
चीमा 31 दिसंबर 2004 को सेवानिवृत्त हुए थे। मार्कफेड ने 6 जुलाई 2005 को उनके वेतनमान में दो चरण की कमी की सजा दी। इससे उनके सेवानिवृत्ति लाभों की गणना प्रभावित हुई। चीमा की 26 सितंबर 2009 को मौत हो गई, तब उनकी विभागीय अपील लंबित थी। उनके बेटे ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सजा को चुनौती दी और पेंशन लाभ मांगे। अदालत ने कहा कि गबन साबित न होने पर भी कर्मचारी की लापरवाही खत्म नहीं होती। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।