सड़क हादसों के कानून की सूक्ष्म व्याख्या को रेखांकित करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में जिला अदालत ने सड़क दुर्घटना के आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख किया। अदालत ने स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम सतीश (1998) केस का हवाला दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि सिर्फ इसलिए कि वाहन तेज रफ्तार था, यह अपने आप में लापरवाही या असावधानी को साबित नहीं करता।
यह मामला 9 अक्टूबर 2018 का है, जब एनएच-73 पर गोलपुरा मोड़ के पास एक कार ने एक मोटरसाइकिल सवार शिव मोहन को पीछे से टक्कर मार दी थी। शिकायतकर्ता अश्विनी कुमार जो पास में सब्जी की दुकान चलाते हैं और प्रत्यक्षदर्शी भी हैं। उन्होंने बताया कि मोटरसाइकिल उचित गति से मौली की ओर से आ रही थी। तभी तेज गति और लापरवाही से एक कार चालक ने उसे पीछे से टक्कर मार दी।
अश्विनी कुमार ने अन्य लोगों की मदद से घायल शिव मोहन को स्वामी देवी दयाल अस्पताल पहुंचाया, लेकिन इलाज के दौरान अगले दिन शिव मोहन की मौत हो गई। इसके बाद रायपुररानी पुलिस ने आरोपी मनीष राणा (नारायणगढ़ निवासी) के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं में लापरवाही से वाहन चलाने और मृत्यु का कारण का केस दर्ज किया था। 27 अगस्त 2019 को मामले में आरोप तय किए गए थे।
नौ गवाहों ने दी गवाही
मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल नौ गवाह पेश किए। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि यह स्थापित नहीं हो सका कि दुर्घटनास्थल पर वास्तव में वाहन चला कौन रहा था। विशेष रूप से प्रत्यक्षदर्शी अश्विनी कुमार ने स्वीकार किया कि वह मौके पर चालक की पहचान नहीं कर सके और पुलिस ने उनसे पहचान के लिए नहीं कहा था। अदालत ने माना कि रिकॉर्ड पर यह सिद्ध नहीं हो पाया कि आरोपी मनीष ही दुर्घटना करने वाला ड्राइवर था। जांच अधिकारी एसआई देवेंद्र कुमार ने भी स्वीकार किया कि आरोपित की गिरफ्तारी के बाद कोई पहचान नहीं कराई गई थी। जबकि अश्विनी कुमार ने कार की तेज रफ़्तार का उल्लेख किया, लेकिन उन्होंने गवाही में यह स्पष्ट नहीं किया कि चालक ने तेज गति के अलावा किस प्रकार लापरवाही या असावधानी से वाहन चला रहा था।
अदालत का फैसला
कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि केवल यह कहना कि वाहन चालक तेज गति से, लापरवाही या असावधानी से चला रहा था, जब तक कि इसे ठोस साक्ष्य से साबित न किया जाए, भारतीय दंड संहिता की धारा 279 और 304ए के तहत लापरवाही और असावधानी साबित नहीं होती। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया।