पंचकूला। किसानों के हित में 1991 में स्थापित किसान मंडी का निजीकरण करना राज्य सरकार के लिए भारी आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है। किसान मजदूर एकता वेलफेयर एसोसिएशन का कहना है कि इस कदम से सरकार के राजस्व में हर माह करीब 8 से 9 लाख रुपये की कमी आएगी।
जानकारी के अनुसार, नगर निगम की स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी के तहत किसान मंडी का निजीकरण करने की योजना बनाई जा रही है। यह मंडी प्रत्येक सप्ताह छह दिन अलग-अलग सेक्टरों में लगती है, जिसमें सैकड़ों दुकानदार अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। मंडी से नगर निगम को हर दुकानदार से 100 रुपये का शुल्क मिलता है, लेकिन 3 फरवरी 2026 से किसान मंडी में दुकानदारों की पर्ची नहीं काटी जा रही है, जिससे दुकानदारों में नाराजगी है।
किसान मजदूर एकता वेलफेयर एसोसिएशन के प्रधान चमन लाल और जनरल सेक्रेटरी शमशेर सिंह ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और वीरवार को नगर निगम कमिश्नर को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में इस मामले की जांच की मांग की गई और कहा गया कि यदि निजीकरण की योजना लागू होती है तो इससे मंडी के दुकानदारों की आजीविका पर असर पड़ेगा। इसके अलावा, किसानों को भी नुकसान हो सकता है।
मामले की पूरी जांच की जाएगी
नगर निगम कमिश्नर विनय कुमार ने दुकानदारों को आश्वासन दिया है कि इस मामले की पूरी जांच की जाएगी और उचित कदम उठाए जाएंगे। इस दौरान करीब 50 दुकानदार उपस्थित थे, जिन्होंने निजीकरण की योजना का विरोध किया और इसे किसान हित में नहीं बताया।