पंचकूला। जिस योग को विश्व पटल पर उतारने के लिए केंद्र सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, उसे मुकाम तक पहुंचाने के लिए लोगों के घरों में झाड़ू - पोंछा लगाने वाली और मजदूरी करने वाली माताएं मील का पत्थर साबित हो रही हैं। अपने बच्चों को योग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक दिलवाने वाली हरियाणा की माताएं खुद भूखी सोईं लेकिन देश का सपना पूरा करने के लिए वे कदम से कदम मिलाकर चलीं। पंचकूला के सेक्टर-3 के ताऊ देवीलाल स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में 4 से 13 जून तक आयोजित होने वाली खेलो इंडिया यूथ गेम्स से पहले आयोजित कैंप में हिस्सा लेने पहुंचे इन माताओं के बच्चों ने यह खुलासा किया है।
इनमें ज्यादातर खिलाड़ी रोहतक, झज्जर, गुरुग्राम, हिसार, पलवल के ग्रामीण क्षेत्रों से हैं, जो चार घंटे की योग के लिए आठ घंटे की साधना करते हैं। इसमें 12 लड़के और लड़कियां शामिल हैं। सभी खिलाड़ी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। इनको फेडरेशन की तरफ से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले खेलों में ग्रेडेशन नहीं मिल पा रहा है, उन्होंने प्रदेश सरकार से गुहार लगाई है कि उन्हें भी दूसरे खेलों की तरह योग फेडरेशन की ओर से होने वाले खेलों में ग्रेडेशन मिले।
विधवा मां की पेंशन और मजदूरी से चलता है घर
रोहतक के गांव कबूलपुर निवासी दीपांशु ने बताया कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। उसकी मां मजदूरी करती हैं, विधवा पेंशन मिलाकर उसके घर का खर्च किसी तरह चलता है। मां उसे हमेशा योग के लिए प्रेरित किया है, वह राष्ट्रीय स्वर्ण पदक विजेता है। कई बार घर में पैसा नहीं होता है तो योग की कक्षा के लिए मां लोगों से कर्ज लेकर बस का किराया देती है, प्रॉपर डाइट भी नहीं मिल पाती। अपने भविष्य को लेकर भी चिंतित हूं, क्योंकि फेडरेशन की तरफ से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूसरे खेलों की तरह योग के खिलाड़ियों को ग्रेडेशन नहीं मिलता है। दूसरे खिलाड़ियों की तरह कैश अवार्ड और डाइट मिलना चाहिए। ऐसा होने से आगे चलकर हम लोगों को नौकरियां मिलें तो हमारा प्रयास भी सार्थक होगा।
डाइट और ग्रेडेशन की मांग
रोहतक की रिटौली निवासी 16 वर्षीय काफी ने बताया कि स्थानीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल में 12वीं की छात्रा है। वह योग में तीन बार राज्य और दो बार राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल हासिल कर चुकी है, लेकिन उसके घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। क्योंकि पिता की कैंसर से मौत के बाद घर चलाने के लिए उसकी मां स्नेहलता स्कूल में खाना पकाती है, जहां उसे महज 3500 रुपये तनख्वाह मिलती है। उसी से घर चलता है। वहीं योग की कक्षा में जाने के लिए कई बार बस का किराया नहीं होता, तो गांव के लोगों की मदद से योग क कक्षाएं अटेंड कर पाती हूं। रिटौली से रोहतक की दूरी करीब 15 किमी है, सुबह और शाम को दो बार योग की कक्षाओं के लिए अपडाउन करना पड़ता है। वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने देश का नाम रोशन करना चाहती है, लेकिन आगे के भविष्य को लेकर चिंतित है।
पिता मजदूर और मां घरों में लगाती है झाड़ू
गुरुग्राम कन्नई निवासी जीतू ने बताया कि पिता मजदूरी करते हैं। मां लोगों के घरों में झाड़ूू लगाने का काम करती है, तो किसी तरह उसके घर चल पाता है। खेलो इंडिया गेम्स में हिस्सा लेने पंचकूला आया हूं। जिस तरह यहां हमें डाइट और किट मिल रहा है, उसी तरह डाइट और किट हमें मिले तो हम और बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, इसके साथ ही योगा के खिलाड़ियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फेडरेशन की ओर से ग्रेडेशन मिलना चाहिए। ताकि हमलोगों का भविष्य में अच्छी नौकरी और खेलने के लिए अच्छा मंच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल सके।
अच्छी डाइट मिले तो करेंगे बेहतर प्रदर्शन
रोहतक के रिटौली निवासी 17 वर्षीय काजल ने बताया कि उसके शरीर में 6 से 7 ग्राम खून रहता है। डॉक्टरों ने अच्छे डाइट की सलाह दी है, लेकिन हमें डाइट नहीं मिलती। जिसके चलते बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रही हूं। 4 जून को होने खेला इंडिया गेम्स के लिए पंचकूला कैंप में आई हूं। यहां अच्छे डाइट का प्रबंध किया गया है। इस तरह हर योगा से जुड़े खिलाड़ी को जिला स्तर डाइट मिले और खेल ग्रेडेशन फेडरेशन की ओर से मिले तो हमलोगों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा।
योग में खिलाड़ी अच्छा कर रहे हैं। इन्हें फेडरेशन की ओर से होने वाले खेलों में ग्रेडेशन मिलना शुरू हो जाए तो आने वाले समय योग से जुड़े खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ियों की तरह विश्व स्तर पर अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। - मनोज कुमार, कोच योग
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