माई सिटी रिपोर्टर
पंचकूला। शहर के सिविल अस्पताल सेक्टर-6 में मनोरोग विभाग में बच्चोंं में चिड़चिड़ापन और बहाने बनाने के मामले लगातार ओपीडी में बढ़ रहे हैं। काउंसलिंग के दौरान पता चला कि बच्चों को अभिभावक समय नहीं दे रहे हैं। इसके साथ ही बच्चों के स्कूल बदलने के बाद पढ़ाने वाले शिक्षकों का व्यवहार अच्छा नहीं है। वे उनसे सही तरीके से बात नहीं करते और अभिभावक भी उन्हें समय नहीं दे पा रहे हैं। अस्पताल में मनोचिकित्सक की प्रतिदिन की ओपीडी 200 सौ तक पहुंच गई है जिसमें 8 मामले बच्चों की ऐसी समस्याओं से जुड़े थे।
पंचकूला मनोचिकित्सक विभाग के डॉ. एमपी शर्मा ने बताया कि बच्चे छोटी-छोटी बातों को दिल पर ले रहे हैं। उनकी पसंद से स्कूल बदलने पर भी बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है। ऐसे में वे एकांत में रहना पसंद करने लगे हैं। इन सबके चलते मानसिक तनाव से ग्रस्त होने लगे हैं।
उन्होंंने कहा कि यदि स्कूल बदलने के कुछ महीने बाद ही बच्चे के व्यवहार में बदलाव आता है तो ऐसी स्थिति में अभिभावक को सचेत हो जाना चाहिए। चूंकि यह बदलाव बच्चे के मनोरोगी बनने का शुरुआती लक्षण माना जा रहा है। बच्चा अकेला रहने लगता है। स्वयं को दूसरे से दूर रखने लगता है, किसी के साथ रहना पसंद रहीं कर रहा है तो वह मानसिक तनाव से गुजर रहा है। ऐसे में अभिभावक को चाहिए कि वे तुरंत बच्चे की काउंसलिंग करवाए और उसके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने की कोशिश करें।
शिक्षकों का व्यवहार अच्छा नहीं
सेक्टर-12ए के बच्चे की पिता काउंसलिंग कराने पंचकूला मनोरोग विभाग आए। बेटा आठवीं कक्षा में पढ़ता है। इसी साल उसका स्कूल बदला है। इसके बाद से उसके व्यवहार में काफी बदलाव देखने को मिला है। वह एकांत में रहने केे साथ-साथ रोने लग जाता है। कभी छाती तो कभी पेट दर्द की बात कहकर स्कूल से छुट्टी लेने की कोशिश करता है। प्रतिदिन स्वास्थ्य खराब होने के बहाने बढ़ गए हैं। जब काउंसलर और डॉक्टर ने बच्चे से स्कूल संबंधी बात की तो पता चला कि नए स्कूल के अध्यापक अच्छे नहीं हैं। उसका दोस्त कोई नहीं बन रहा है। अभिभावक भी सही तरीके से बात नहीं करते हैं।
बच्चे का स्कूल बदलने से बढ़ी परेशानी
बच्चे की काउंसलिंग कराने आए सेक्टर-16 निवासी व्यक्ति ने बताया कि उनका बेटा बीते मई में बीमार हो गया था। इसके बाद उन्होंने उसका स्कूल बदल दिया। स्कूल बदलने के बाद वह बीमारी का बहाना बनाने लगा। इसके बाद काउंसलिंग हुई तो पता चला कि उसे पुराने दोस्तों के बिछड़ने का दुख था। वह जो बातें अपने दोस्तों से दैनिक दिनचर्या की बातें शेयर कर लेता था, अपने अभिभावकों से नहीं कर पा रहा है। अभिभावक भी उसे समय नहीं दे रहे हैं। इस कारण वह परेशान रहता है। वह बिना बोले एकांत में रहता है। उसके व्यवहार में बदलाव आना शुरू हो गया।
डॉ. एमपी शर्मा, मनोरोग विभाग, सिविल अस्पताल सेक्टर-6 ने बताया कि बदलते समय के साथ अभिभावक अपने काम-काज में इतना व्यस्त रहने लगे हैं कि वह अपने बच्चों के साथ समय नहीं बिता रहे हैं। इस कारण बच्चे अपनी बातें साझा नहीं कर हैं। इस कारण उनमेंं चिड़चिड़ापन भी बढ़ रहा है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चे के साथ दिन मेंं कुछ समय जरूर व्यतीत करें।