पंचकूला के मोरनी क्षेत्र में किसानों को नौतोड़ भूमि का मालिकाना हक दिलाने की मांग को लेकर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर वीरवार को जस्टिस एसएस सारों और जस्टिस लीजा गिल की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता से मोरनी में वन भूमि की अधिसूचना की प्रति कोर्ट में पेश करने को कहा। याचिका पर अगली सुनवाई सात सितंबर को होगी।
शिवालिक विकास मंच के प्रदेशाध्यक्ष विजय बंसल की ओर से दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि 30 अगस्त, 2014 को अतिरिक्त मुख्य सचिव राजस्व विभाग एवं वन विभाग व प्रधान मुख्य वन पाल महानिदेशक (भूमि रिकॉर्ड) को कानूनी नोटिस भेजकर मोरनी क्षेत्र के किसानों को नौतोड़ भूमि का मालिकाना हक देने की मांग की गई थी। इससे पहले याचिकाकर्ता ने इस बारे में हरियाणा के मुख्यमंत्री और भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर उक्त मांग की थी।
प्रधानमंत्री कार्यालय ने 28 जनवरी, 2013 को मुख्य सचिव हरियाणा को मोरनी क्षेत्र के किसानों को नौतोड़ भूमि का मालिकाना हक संबंधी मामले के तुरंत समाधान के आदेश दिए, लेकिन हरियाणा सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की। याचिका में कहा गया है कि मोरनी क्षेत्र के निवासी पारंपरिक तौर पर कृषि पर निर्भर हैं और इनमें से अधिकतर भूमिहीन लोग हैं या 70 के दशक में इस क्षेत्र की 14 भोज कोटाहा की भूमि के मालिक गढ़ी कोटाहा के मीर के किराएदार हैं।
मोरनी के लोगों की समस्या उस समय शुरू हुई, जब हरियाणा सरकार ने गढ़ी कोटाहा के मीर की भूमि अधिग्रहीत कर इसे वन विभाग के सुपुर्द कर दिया और इसे आरक्षित एवं संरक्षित वन का दर्जा दिया। याचिका में कहा गया है कि इस क्षेत्र की भूमि को वन क्षेत्र घोषित किए जाने के 40 साल बाद तक क्षेत्रीय लोगों को उनका हक नहीं मिला है।
याचिका में कहा गया कि हरियाणा वन विभाग की ओर से गढ़ी कोटाहा के मीर की जागीर पहले 30 वर्ष के लिए पट्टे पर ली गई थी। क्षेत्र के लोगों की समस्या सुलझाने के लिए 1987 में तत्कालीन कमिश्नर टीडी जोगपाल की ओर से विस्तृत जांच रिपोर्ट हरियाणा सरकार को सौंपी गई थी, जिसमें शिवालिक बोर्ड का गठन कर वन विभाग की ओर से मोरनी खंड में जमीन का बंदोबस्त करने को कहा गया था। याचिकाकर्ता का कहना है कि उन्हें आरटीआई के जरिए जानकारी मिली है कि हरियाणा सरकार ने जोगपाल की सिफारिश पर कोई अमल नहीं किया।
वहीं, हरियाणा वन विभाग बंदोबस्त के नाम पर 1.64 करोड़ रुपये राजस्व कर्मचारियों को वेतन के रूप में दे चुका है। याचिका में बताया गया कि स्थानीय लोगों की मलकियत माल रिकॉर्ड के अनुसार रकबा 9191 एकड़ है और आबादी 14 भोज कोटाहा- रास्ता जात, चश्मे, पानी, शमशान घाट, मंदिर देव स्थान आदि का रकबा 906 एकड़ कुल जमीन 8285 एकड़ है।
इसके अलावा अधिग्रहण के बाद जो रिकॉर्ड माल में दर्ज है, प्रदेश सरकार की मलकीयत 558 एकड़ है। जो रकबा मौका काश्त है, वह रिकॉर्ड माल में दर्ज नहीं है और वह 642 एकड़ है। वन विभाग हरियाणा की ओर से कुल रकबा 1846 एकड़ को नौतोड़ भूमि माना गया है, जो विवादास्पद है और इसी रकबे का राजस्व बंदोबस्त किया जाना है। याचिकाकर्ता ने इसी भूमि को स्थानीय लोगों को सौंपने की मांग याचिका में की है।