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पीजीआई में मिली रुसवाई, बिना इलाज सोनभद्र लौटे राधेश्याम

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चंडीगढ़। देश के सबसे बड़े संस्थानों में शुमार पीजीआई की अव्यवस्था से खिन्न राधेश्याम सोनभद्र लौट गए। 14 दिन तक काउंटर पर धक्के खाते रहे, लेकिन रिपोर्ट नहीं मिली। पीजीआई निदेशक से शिकायत की तो स्टाफ का व्यवहार ही बदल गया। सभी इस तरह से पेश आ रहे थे, जैसे कोई गुनहगार हो। अपनी बीमारी से परेशान राधेश्याम ने आखिरकार दुखी मन से चंडीगढ़ से जाने का फैसला कर लिया और अपनी जिंदगी को मुकद्दर पर छोड़ दिया। 28 अक्तूबर को अपने घर लौट गये हैं।
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राधेश्याम ने बताया कि किसी का भी व्यवहार यहां उचित नहीं था। हर कोई यूं बात करता था, मानो अहसान कर रहा है। बड़ा नाम सुना था पीजीआई का। मरीज यहां से जिंदगी लेकर लौटते हैं मगर मुझे रुसवाई मिली। इलाज तो दूर सीटी स्कैन की जांच रिपोर्ट तक नहीं मिली। इनके पास हजारों झूठी दलीलें हैं। कह रहे हैं मैं रिपोर्ट लेने नहीं गया जबकि मैं और मेरा भतीजा काउंटर पर लगातार चक्कर काटते रहे। किसी ने सीधे मुंह बात तक तो की नहीं। स्वास्थ्य सेवा से जुड़े कर्मचारियों को समझना चाहिए कि पहले ही बीमारी से जूझ रहे मरीजों का दर्द अपने दुर्व्यवहार से और न बढ़ाएं। खैर! मेरी किस्मत में जो लिखा है, वही मंजूर। लेकिन पीजीआई के प्रति जो सोच थी, वह चकनाचूर हो गई।
पीजीआई कर्मचारी संघ गैर संकाय के अध्यक्ष अश्वनी कुमार मुंजाल का कहना है कि मरीज को प्रताड़ित किया जा रहा है। पीजीआई टेली कंसल्टेशन को बढ़ावा देने की बात कर रहा है, लेकिन सूचना के अभाव में मरीज इलाज कराए बिना लौट रहे हैं। इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। यह सिर्फ राधेश्याम के साथ ही नहीं हुआ है। राधेश्याम की रिपोर्ट तो अल्ट्रासाउंड के नाम पर रोके रखी, लेकिन अन्य मरीजों के साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है। अश्वनी का कहना है कि अगर मरीज का अल्ट्रासाउंड करना था तो उसे उसी वक्त क्यों नहीं बताया गया। मरीज ने जब इसकी शिकायत की तो अलग-अलग दलीलें दी जा रही हैं। सीटी स्कैन के दौरान ही यह पता चल जाता है कि मरीज का अल्ट्रासाउंड भी होना है। सीटी स्कैन करके उसकी रिपोर्ट में ही नीचे अगली जांच के लिए सलाह देने का मानक तय किया गया है। फिर ऐसा क्यों नहीं किया गया। स्थिति बहुत खराब है। मरीज अपना इलाज कराने के लिए जांच की फिल्म बिना रिपोर्ट के ही ले जाने को मजबूर हैं। मरीजों को सूचना देने की व्यवस्था फेल है।
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कोट
सीटी स्कैन की रिपोर्ट में कुछ आशंका थी। इसके कारण मरीज का अल्ट्रासाउंड करना जरूरी था। अल्ट्रासाउंड के लिए उसे अलग से खर्च नहीं करना पड़ता। लेकिन मरीज या उसके परिजनों ने एक बार भी रिपोर्ट काउंटर या डॉक्टर से संपर्क नहीं किया। अगर मरीज आया होता तो उसका अल्ट्रासाउंड करके दोनों रिपोर्ट उसे दे दी जातीं। -प्रो. एसएस संधू, रेडियो डायग्नोसिस एंड इमेजिंग विभाग पीजीआई
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