चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि भ्रष्टाचार के मामले में अग्रिम जमानत केवल असाधारण मामलों में ही दी जा सकती है। न्यायालय को प्रथम दृष्टया शिकायत में झूठे आरोप, राजनीतिक प्रतिशोध या स्पष्ट तुच्छता के बारे में संतुष्ट होना आवश्यक है।
फतेहगढ़ साहिब में पटवारी केवल सिंह ने अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करते हुए हाईकोर्ट को बताया कि उस पर आरोप है कि उसने सह-आरोपी बलकार सिंह (पंचायत समिति कार्यालय के अधीक्षक) के साथ मिलकर शिकायतकर्ता से जांच में अनुकूल रिपोर्ट देने के लिए 60,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि धन की बरामदगी याचिकाकर्ता से नहीं, बल्कि सह-आरोपी बलकार सिंह से हुई है और उसे फंसाया गया था।
दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला केवल मौखिक शिकायत पर आधारित नहीं है, बल्कि दस्तावेजी और सामग्री से पुष्ट होता है, जिसमें ऑडियो रिकॉर्डिंग आदि शामिल है। कोर्ट ने कहा कि आरोपों की गंभीरता, आधिकारिक पद के गंभीर दुरुपयोग तथा जनता के विश्वास के उल्लंघन को दर्शाती है। यह तर्क कि जांच रिपोर्ट 29 मार्च, 2024 को पहले ही प्रस्तुत कर दी गई थी, अपने आप में पूर्व या बाद के कदाचार की संभावना को खारिज नहीं करता है।
विशिष्ट आरोपों को ट्रैप कार्यवाही सहित प्रारंभिक सामग्री का समर्थन है और यह कथित अपराध में याचिकाकर्ता की प्रथम दृष्टया संलिप्तता का संकेत देता है। आरोपों की गंभीरता लोक सेवक को हिरासत में लेकर गहन जांच की आवश्यकता बताती है। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।