राग पूरिया धनश्री में ‘अब तो ऋतुमन..’ सुनकर श्रोता हुए मंत्रमुग्ध
-वेंकटेश कुमार ने 49वें भास्कर राव नृत्य और संगीत सम्मेलन में राग पूरिया, राग केदार और राग भैरवी से जीता श्रोताओं का दिल
-टैगोर थियेटर में आयोजित कार्यक्रम का आगाज चंडीगढ़ प्रशासक के सलाहकार मनोज परिदा ने किया
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़।
अब तो ऋतुमन....राग पूरिया धनश्री में निबद्ध रचना जैसे ही पंडित वेंकटेश ने टैगोर थियेटर के आडिटोरियम में गाई श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए। मौका था प्राचीन कला केंद्र द्वारा आयोजित 49वें भास्कर राव नृत्य और संगीत सम्मेलन का। इसका आगाज टैगोर थियेटर में मंगलवार से हुआ। इस सम्मेलन के दौरान देश के नामी गिरामी आर्टिस्ट भाग लेंगे। इस अवसर पर चंडीगढ़ प्रशासक के सलाहकार मनोज परिदा मुख्य मेहमान थे। उनके अलावा केंद्र के चेयरमैन एसके मोंगा, रजिस्ट्रार डॉ. शोभा कौसर और सचिव सजल कौसर भी कार्यक्रम में मौजूद रहे। इस मौके पर दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का आगाज किया गया। इस दौरान केंद्र की वार्षिक मैगजीन का अनावरण भी किया गया।
पंडित वेंकटेश ने राग पूरीया धनाश्री से कार्यक्रम का आगाज किया। इसमें उन्होंने विलंबित एक ताल में निबद्ध रचना ‘अब तो ऋतुमन..’ पेश किया। इसके बाद राग केदार में निबद्ध रचना ‘झंकार’ पेश करके उन्होंने वाहवाही बटोरी। कार्यक्रम का समापन वेंकटेश ने राग भैरवी में निबद्ध रचना से किया। उनके साथ हारमोनियम पर पैरोमिता मुखर्जी और तबले पर कोलकता के जाने माने तबला वादक परिमल चक्रवर्ती ने बखूबी संगत की। इस मौके पर पुनीत बावा ने मंच संचालित किया।
शास्त्रीय संगीत के चार हस्तियों को किया सम्मानित
भास्कर राव नृत्य और संगीत सम्मेलन के पहले दिन शास्त्रीय संगीत की जानी मानी चार हस्तियों को उनके अपने क्षेत्र में अविस्मरणीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इनमें शास्त्रीय गायिका प्रमिला पुरी, प्रसिद्ध कला समीक्षक रवींद्र मिश्रा, थियेटर और कला जगत के प्रसिद्ध कलाकार कमल तिवारी और चंडीगढ़ के जाने माने कला समीक्षक एसडी शर्मा शामिल थे। इन सभी हस्तियों को शॉल, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिन्ह के साथ 25000 रुपये देकर सम्मानित किया गया।
किराना घराने की शान हैं वेंकटेश कुमार
शास्त्रीय गायन की प्रस्तुति देने वाले पंडित वेंकटेश किराना घराने की शान माने जाते हैं। उनकी सधी हुई गायिकी वास्तव में कमाल है। उन्होंने गवई आश्रम में 12 वर्ष तक संगीत की शिक्षा हासिल की। इसमें उन्होंने किराना और ग्वालियर घराने की बारीकियों को सीखा। उनके संगीत में दो घरानों का सम्मिश्रण किया। उन्होंने देश ही नहीं, विदेशों में भी अपनी कला की धाक जमाई है।