साहित्य संस्था ‘मंथन, चंडीगढ़’ द्वारा कवि दरबार का आयोजन
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़।
साहित्य संस्था ‘मंथन’, चंडीगढ़ की ओर से रविवार को सेक्टर-52 स्थित गीता भवन में कवि दरबार का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता साहित्यकार डॉक़ैलाश आहलूवालिया ने की। मुयातिथि के तौर पर व्यंग्यकार प्रेम विज ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। मंच संचालन गजलकार डॉस़ुशील ‘हसरत’ नरेलवी ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ विशेष आमंत्रित तीन कवियों के रचना पाठ व उन पर हुई चर्चा से हुआ। सर्वप्रथम कवि विरेंद्र शर्मा ‘वीर’ ने अपनी पांच कविताएं, ‘वो मज़दूर है’, ‘अर्धागंनी’, ’पुश्तैनी घर’, ‘नदी की आत्मकथा’ व ‘ओ पगले ज़रा तू हट ले’ सुनाकर माहौल को ़ाुशगवार बनाया। विरेन्द्र की कविताओं के कथ्य में विरासत व धरोहर के प्रति सम्मान, मज़दूर की व्यथा के प्रति क्षोभ व आधुतिकता के नाम पर प्रकृति के साथ छेड़छाड़, केंद्र में रहे। तदुपरांत कवि अश्विनी ने कविताएं ‘क्या यही राम-कृष्ण की धरती है’, बिटिया का जन्म’, ‘प्रकृति-धूप’, क़लम, पेन, पैंसिल’, व ‘पति-पत्नी’ पेश कीं, जिनमें व्यवस्था पर व्यंग्य, रिश्तों के मध्य पनपती कड़वाहट, प्रकृति-प्रेम व बेटी के प्रति स्नेह झलकता है। तत्पश्चात कवि आनन्द बिहारी ने कविताएं ‘महाबली बजरंग बली बस इतना कर दे आज’, ‘सूरज की मक्कारी देख’, ‘भरोसा कर नहीं सकता’ एवं ‘मैं फौजी हूँ’ सुनाईं, जिसके माध्यम से इन्होंने सामाजिक विद्रुपता पर कटाक्ष किये। तीनों कवियों की कविताओं ने ख़ूब वाहवाही बटोरी तथा हरेक कवि की कविता पर विस्तृत चर्चा हुई।
तदुपरांत दूसरे सत्र का प्रारा कवि राजन ‘ग़रीब’ की ग़ज़ल ‘लोग हौसले मेरे ़ाूब आजमाते हैं’ से हुआ। तत्पश्चात कवयित्री डॉम़ॱरला कौशिक ‘स़खी ने कविता ‘़खामोश’, गजलकार सुशील ‘हसरत’ नरेलवी ने ग़ज़ल ‘कब कहाँ किसने किसी का ग़म समेटा/दास्तां सबको सुनाकर मैंने देा’, कवि जोगिन्द्र वत्स ने कविता ‘़ात’, कविराज वलवन्त सिँह रावत ने ग़ज़ल ‘कोई हँसता है किसी दुािया की आँा छलकती है’, कवि शमशेर ने ग़ज़ल, कवि राजेश पंकज ने कविता ‘पिता का एकाकीपन’, कवि ओप़ीस़ौंधी ने कविता, कवि प्रेम विज ने कविता ‘मैं सिद्घार्थ नहीं हूँ, ग़ज़लकार दर्शन वासन ने ग़ज़ल ‘ग़मज़दा दिल में मेरे तन्हाइयाँ हँसती रहीं’, ग़ज़लकार अनिल ने ग़ज़ल ‘है बड़ा ही पुऱातर रहने ाी दो’, कवि दीपक ोतरपाल ने कविता, कवि कैलाश आहलूवालिया ने कविताएं ‘हमें ये ाी पता था’ व ‘कुछ किताबें बोलती हैं सुबह-सुबह’ व गजलकार जय गोपाल ‘अश्क’ अमृतसरी ने पंजाबी ग़ज़ल -ज़मीं ते बैठ के ओ तारयां दी गल करदा‘ से समां बाँधा व ़ाूब तालियाँ बटोरीं। इसके अतिरिक्त सुप्रसिद्घ हास्य कलाकार सतीश पापुलर ने हास्य फुहारों से श्रोताओं को खूब हँसाया।
अध्यक्षीय व्यक्तव्य में सुप्रसिद्घ साहित्यकार डॉक़ैलाश आहलूवालिया ने कहा कि सभी कवियो की कविताओं, गजलों व गीतों में विचार व विषय का सुन्दर ताना-बाना देखने को मिला। मुख्यातिथि महोदय प्रेम विज ने कहा कि ‘‘आज का कवि सजग है। वह अपने आस-पास को आँखें खोलकर देखता है और फिर लिखता है।’’
अंत में संस्था की प्रेस सचिव डॉम़ॱरला कौशिक ‘सखी’ ने सभी साहित्यकार, साहित्य प्रेमियों व श्रोतागणों का आभार प्रकट किया।